अध्याय 1 / 19
हज और उमरा: मायने, फ़र्ज़ियत और सवाब
हज और उमरा क्या हैं, किन पर लाज़िम हैं, हज हमें इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हज्जतुल-विदा से कैसे मिला, और मब्रूर, यानी क़बूल हुआ, हज कैसा होता है।

हज और उमरा क्या हैं
हज हज के महीनों में मक्का में काबा (अल्लाह का घर, बैतुल्लाह) की तरफ़ जाना है ताकि कुछ ख़ास इबादतें ख़ास तरीक़े से और ख़ास वक़्तों पर अदा की जाएँ। इसका केंद्रीय दिन 9 ज़िलहिज्जा, यौमे-अरफ़ा, है और यह इस्लाम का पाँचवाँ स्तंभ है।
उमरा काबा की ज़ियारत है ताकि कुछ छोटे अमल, एहराम, तवाफ़, सई और बाल कटवाना, अदा किए जाएँ, और हज के उलट यह साल भर (हज के मनासिक के दिनों को छोड़कर) किसी भी वक़्त अदा हो सकता है। इसे कभी-कभी "छोटा हज" भी कहा जाता है।
हनफ़ी मसलक में हज हर उस मुसलमान पर उम्र में एक बार फ़र्ज़ है जो इसकी इस्तिताअत रखता हो। उमरा सुन्नते-मुअक्कदा है, उम्र में एक बार: इसका बड़ा सवाब है और इसे छोड़ना नहीं चाहिए, मगर यह हज की तरह फ़र्ज़ नहीं है। पहले हज के बाद जो कुछ भी हो वह नफ़्ली इबादत है।
وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا ۚ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ
उच्चारण Wa lillāhi ʿalan-nāsi ḥijjul-baiti manistaṭāʿa ilaihi sabīlā, wa man kafara fa innallāha ghaniyyun ʿanil-ʿālamīn.
अर्थ और अल्लाह के लिए लोगों पर इस घर का हज लाज़िम है, जो उस तक पहुँचने की ताक़त रखता हो। और जो इनकार करे तो अल्लाह तमाम जहानों से बेनियाज़ है।
सूरह आले-इमरान 3:97
وَأَتِمُّوا الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ لِلَّهِ
उच्चारण Wa atimmul-ḥajja wal-ʿumrata lillāh.
अर्थ और अल्लाह के लिए हज और उमरा पूरा करो।
सूरह अल-बक़रा 2:196
इब्राहीम की पुकार और तलबिया
जब इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनके बेटे इस्माईल अलैहिस्सलाम काबा की बुनियादें उठा चुके तो अल्लाह ने इब्राहीम को हुक्म दिया कि लोगों में हज का एलान करें (सूरह अल-हज 22:27)। हर हाजी जो तलबिया कहता है वह इसी पुकार का जवाब देता है: "हाज़िर हूँ, ऐ अल्लाह, हाज़िर हूँ।"
उलमा बयान करते हैं कि जिस हाजी की नीयत ख़ालिस हो और तोशा व माल हलाल हो उसे ख़ुश-आमदीद और ख़ुशख़बरी का जवाब मिलता है, और जिसका माल हराम हो उसे कहा जाता है कि तेरी पुकार क़बूल नहीं। सबक़ सीधा और संजीदा है: घर से निकलने से पहले अपनी नीयत और अपना माल पाक कर लें।
لَبَّيْكَ اللّٰهُمَّ لَبَّيْكَ، لَبَّيْكَ لَا شَرِيكَ لَكَ لَبَّيْكَ، إِنَّ الْحَمْدَ وَالنِّعْمَةَ لَكَ وَالْمُلْكَ، لَا شَرِيكَ لَكَ
उच्चारण Labbaik Allāhumma labbaik, labbaika lā sharīka laka labbaik, innal-ḥamda wan-niʿmata laka wal-mulk, lā sharīka lak.
अर्थ हाज़िर हूँ ऐ अल्लाह, हाज़िर हूँ। हाज़िर हूँ, तेरा कोई शरीक नहीं, हाज़िर हूँ। सारी तारीफ़, सारी नेमतें और सारी बादशाही तेरी है। तेरा कोई शरीक नहीं।
इस्लाम में हज का एक संक्षिप्त इतिहास
- हनफ़ी किताबों के मुताबिक़ हज हिजरत के 9वें साल फ़र्ज़ हुआ (दूसरी राएँ इससे पहले बताती हैं)।
- 6 हिजरी में नबी ﷺ लगभग 1,500 सहाबा के साथ उमरे के लिए निकले मगर हुदैबिया में रोक दिए गए, जहाँ मशहूर संधि हुई।
- 7 हिजरी में वे लौटे और क़ज़ा उमरा (उमरतुल-क़ज़ा) अदा किया।
- 8 हिजरी में, रमज़ान में, मक्का मुसलमानों के लिए फ़तह हुआ और काबा के गिर्द के बुत हटा दिए गए।
- 10 हिजरी में नबी ﷺ ने एलान किया कि आप हज करेंगे। आप 25 ज़िलक़ादा को अपनी पत्नियों के साथ मदीना से रवाना हुए, और सहाबा की एक बड़ी तादाद आपके पीछे हो ली। यह हज हज्जतुल-इस्लाम, हज्जे-अकबर और हज्जतुल-विदा (विदाई का हज) के नाम से जाना जाता है। यही वह नमूना है जिसकी हर हाजी पैरवी करता है, और अरफ़ात का इसका ख़ुतबा इस्लामी इतिहास के सबसे अहम ख़ुतबों में से है। आपने इसे क़ारिन के तौर पर अदा किया, इसीलिए हनफ़ी मसलक में क़िरान को सबसे बेहतर तरीक़ा माना जाता है।

हज किस पर फ़र्ज़ है: फ़र्ज़ियत की शर्तें
हज उस शख़्स पर फ़र्ज़ होता है जिसमें ये सारी शर्तें पाई जाएँ:
| शर्त | इसका मतलब |
|---|---|
| इस्लाम | ग़ैर-मुस्लिम पर ज़रूरी नहीं। |
| बालिग़ होना (बुलूग़) | बच्चे पर फ़र्ज़ नहीं। बच्चे का हज सही है और उस पर सवाब मिलता है, लेकिन बालिग़ होने के बाद उसे दोबारा हज करना होगा। |
| अक़्ल का ठीक होना | जो शख़्स अक़्ल के ठीक न हो उस पर फ़र्ज़ नहीं। |
| आज़ाद होना | तारीख़ी तौर पर ग़ुलाम पर फ़र्ज़ नहीं था। |
| इस्तिताअत (istita'ah) | वहाँ जाने-आने का ज़रिया, काफ़ी तोशा, महफ़ूज़ रास्ता, और इतनी सेहत होना (या मदद करने वाला कोई होना)। |
इस्तिताअत में शामिल है:
- आने-जाने का किराया।
- सफ़र का तोशा और ख़र्च, और अपनी ग़ैरमौजूदगी में घर पर जिनकी कफ़ालत उसके ज़िम्मे है उनके लिए काफ़ी इंतज़ाम।
- ऐसा सफ़र जो जाने-आने में मुनासिब हद तक महफ़ूज़ हो।
- सफ़र की इजाज़त देने वाली जिस्मानी सेहत।
- वहाँ पहुँचने और मनासिक पूरे करने के लिए काफ़ी वक़्त।
किसी की तरफ़ से हज (हज्जे-बदल)। जो शख़्स साधन रखता हो लेकिन हमेशा के लिए सफ़र से मजबूर हो, ऐसी बीमारी की वजह से जिससे शिफ़ा की उम्मीद न हो या बहुत बुढ़ापे की वजह से, उसे चाहिए कि अपनी तरफ़ से किसी को हज के लिए भेजे। जो शख़्स हज फ़र्ज़ होने के बाद उसे अदा किए बिना मर जाए, वह वसीयत कर जाए कि उसके तरके से हज करवाया जाए। बेहतर यह है कि बदली हज करने वाला पहले अपना हज कर चुका हो।
औरतों के लिए अतिरिक्त शर्त। औरत के साथ सफ़र में उसका शौहर या कोई महरम होना ज़रूरी है। देखें अध्याय 15।
हज का सवाब
- आपको "अल्लाह के मेहमान" (ज़ुयूफ़ुर्रहमान) का दर्जा मिलता है।
- आपको बड़ा सवाब मिलता है।
- आप यहूदी या ईसाई मरने से बच जाते हैं, यह उस शख़्स के लिए चेतावनी है जिसने हज की ताक़त होते हुए हज नहीं किया।
- आपको हाजियों के लिए नबी ﷺ की मग़फ़िरत की दुआ की शफ़ाअत मिलती है।
- आप नवजात बच्चे की तरह पाक हो जाते हैं।
- यह जिहाद की बेहतरीन क़िस्मों में से है।
- मक़बूल हज का बदला जन्नत के सिवा कुछ नहीं।
الْحَجُّ الْمَبْرُورُ لَيْسَ لَهُ جَزَاءٌ إِلَّا الْجَنَّةُ
उच्चारण Al-ḥajjul-mabrūru laisa lahu jazā'un illal-jannah.
अर्थ मब्रूर (मक़बूल) हज का बदला जन्नत के सिवा कुछ नहीं।
हदीस, बुख़ारी और मुस्लिम में रिवायत है
مَنْ حَجَّ لِلّٰهِ فَلَمْ يَرْفُثْ وَلَمْ يَفْسُقْ رَجَعَ كَيَوْمِ وَلَدَتْهُ أُمُّهُ
उच्चारण Man ḥajja lillāhi fa lam yarfuth wa lam yafsuq rajaʿa ka yawmi waladat-hu ummuh.
अर्थ जिसने अल्लाह के लिए हज किया, और बेहूदगी व गुनाह से बचा रहा, वह उस दिन की तरह लौटता है जिस दिन उसकी माँ ने उसे जना था।
हदीस, बुख़ारी और मुस्लिम में रिवायत है
दुनिया में फ़ायदे
- दुनिया भर के मुसलमान एक-दूसरे से मिलते हैं।
- तिजारत और अर्थव्यवस्था को फ़ायदा होता है।
- सब मुसलमानों की बराबरी ज़ाहिर होती है।
आख़िरत के फ़ायदे
- अपने आपको इबादत के लिए वक़्फ़ करने की तरबियत।
- मुस्लिम शख़्सियत बनाने की तरबियत।
- इस दुनिया से रुख़्सत होने के लिए तैयार रहने की तरबियत।
- काबा को देखने का सवाब।
- हर अमल को सिर्फ़ अल्लाह के लिए ख़ालिस करने की तरबियत।
- फ़रिश्तों के सामने अल्लाह की तरफ़ से तारीफ़ पाना।
- हज्जे-मब्रूर पाना।
हज को मब्रूर क्या बनाता है
| दर्जा | बयान |
|---|---|
| हाजी मब्रूर | सबसे ऊँचा और बेहतरीन हज: इसके सारे गुनाह माफ़ होते हैं, हाजी ज़िंदगी भर इबादत पर क़ायम रहता है, और जन्नत का वादा है। |
| हाजी मक़बूल | सही हज, जिसमें हाजी के गुनाह माफ़ होते हैं। |
| हाजी मरदूद | वह हज जो क़बूल नहीं होता, शर्तों और अरकान में कमी की वजह से, या दूसरी वजहों से। |
जाने से पहले
- अपनी नीयत सिर्फ़ अल्लाह के लिए रखें, किसी उपाधि, तस्वीरों या तारीफ़ के लिए नहीं।
- मनासिक अच्छी तरह सीखें और हलाल ज़राए से काफ़ी रक़म साथ लें, अपने ज़िम्मे की ज़कात अदा करने के बाद।
- यह पक्का कर लें कि आप इस्लाम के दूसरे स्तंभों, ख़ासकर पाँच वक़्त की नमाज़, को पहले से अच्छी तरह अदा कर रहे हैं।
हज के दौरान
- हर फ़र्ज़ और वाजिब अमल सही तरह अदा करें।
- एहराम की पाबंदियों का एहतराम करें, और जो दम (जुर्माना) लाज़िम हो उसे अदा करें।
- रफ़स (अश्लील बात), फ़ुसूक़ (गुनाह) और जिदाल (झगड़ा) से बचें, सूरह अल-बक़रा 2:197।
लौटने के बाद
- गुनाह और ज़्यादती से दूर रहें।
- और नेक अमल करें, ताकि आपका ईमान बढ़ता रहे।
- अपने अख़लाक़ और बर्ताव को ज़िंदगी भर लगातार बेहतर बनाते रहें।

اللّٰهُمَّ اجْعَلْهُ حَجًّا مَبْرُورًا، وَسَعْيًا مَشْكُورًا، وَذَنْبًا مَغْفُورًا، وَعَمَلًا صَالِحًا مَقْبُولًا، وَتِجَارَةً لَنْ تَبُورَ
उच्चारण Allāhummajʿalhu ḥajjan mabrūrā, wa saʿyan mashkūrā, wa dhanban maghfūrā, wa ʿamalan ṣāliḥan maqbūlā, wa tijāratan lan tabūr.
अर्थ ऐ अल्लाह, इसे मक़बूल हज बना दे, क़द्र किया जाने वाला प्रयास, बख़्शे हुए गुनाह, क़बूल होने वाले नेक अमल, और ऐसी तिजारत जो कभी घाटे में न जाए।
यह गाइड कैसे तरतीब दी गई है
अध्याय उसी क्रम में हैं जिसमें आपको उनकी ज़रूरत पड़ेगी:
- 1 · मायने, फ़र्ज़ियत और सवाब, यही अध्याय।
- 2 · एक नज़र में हज, पूरा सफ़र एक तस्वीर में।
- 3 · अपने दिल और अपने मामलात की तैयारी।
- 4 · मुक़द्दस सरज़मीन, मक्का, काबा और हज के मक़ामात।
- 5 · फ़र्ज़, वाजिब और हज अदा करने के तीन तरीक़े।
- 6–10 · ख़ुद मनासिक: एहराम, उसकी पाबंदियाँ और जुर्माने, तवाफ़, सई और बाल कटवाना और एहराम से निकलना।
- 11–13 · हज के दिन: अरफ़ात, मुज़दलिफ़ा और मिना और जमरात।
- 14 · उमरा चरण-दर-चरण।
- 15–17 · औरतों के मसाइल, पाकी और नमाज़, और सेहत और हिफ़ाज़त।
- 18 · तवाफ़े-विदा और मदीना की ज़ियारत।
- 19 · योजना और व्यावहारिक बातें।