अध्याय 1
हज और उमरा: मायने, फ़र्ज़ियत और सवाब
हज और उमरा क्या हैं, किन पर लाज़िम हैं, हज हमें इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हज्जतुल-विदा से कैसे मिला, और मब्रूर, यानी क़बूल हुआ, हज कैसा होता है।

हज और उमरा क्या हैं
हज हज के महीनों में मक्का में काबा (अल्लाह का घर, बैतुल्लाह) की तरफ़ जाना है ताकि कुछ ख़ास इबादतें ख़ास तरीक़े से और ख़ास वक़्तों पर अदा की जाएँ। इसका केंद्रीय दिन 9 ज़िलहिज्जा, यौमे-अरफ़ा, है और यह इस्लाम का पाँचवाँ स्तंभ है।
उमरा काबा की ज़ियारत है ताकि कुछ छोटे अमल, एहराम, तवाफ़, सई और बाल कटवाना, अदा किए जाएँ, और हज के उलट यह साल भर (हज के मनासिक के दिनों को छोड़कर) किसी भी वक़्त अदा हो सकता है। इसे कभी-कभी "छोटा हज" भी कहा जाता है।
हनफ़ी मसलक में हज हर उस मुसलमान पर उम्र में एक बार फ़र्ज़ है जो इसकी इस्तिताअत रखता हो। उमरा सुन्नते-मुअक्कदा है, उम्र में एक बार: इसका बड़ा सवाब है और इसे छोड़ना नहीं चाहिए, मगर यह हज की तरह फ़र्ज़ नहीं है। पहले हज के बाद जो कुछ भी हो वह नफ़्ली इबादत है।
وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا ۚ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ
उच्चारण Wa lillāhi ʿalan-nāsi ḥijjul-baiti manistaṭāʿa ilaihi sabīlā, wa man kafara fa innallāha ghaniyyun ʿanil-ʿālamīn.
अर्थ और अल्लाह के लिए लोगों पर इस घर का हज लाज़िम है, जो उस तक पहुँचने की ताक़त रखता हो। और जो इनकार करे तो अल्लाह तमाम जहानों से बेनियाज़ है।
सूरह आले-इमरान 3:97
وَأَتِمُّوا الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ لِلَّهِ
उच्चारण Wa atimmul-ḥajja wal-ʿumrata lillāh.
अर्थ और अल्लाह के लिए हज और उमरा पूरा करो।
सूरह अल-बक़रा 2:196
इब्राहीम की पुकार और तलबिया
जब इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनके बेटे इस्माईल अलैहिस्सलाम काबा की बुनियादें उठा चुके तो अल्लाह ने इब्राहीम को हुक्म दिया कि लोगों में हज का एलान करें (सूरह अल-हज 22:27)। हर हाजी जो तलबिया कहता है वह इसी पुकार का जवाब देता है: "हाज़िर हूँ, ऐ अल्लाह, हाज़िर हूँ।"
उलमा बयान करते हैं कि जिस हाजी की नीयत ख़ालिस हो और तोशा व माल हलाल हो उसे ख़ुश-आमदीद और ख़ुशख़बरी का जवाब मिलता है, और जिसका माल हराम हो उसे कहा जाता है कि तेरी पुकार क़बूल नहीं। सबक़ सीधा और संजीदा है: घर से निकलने से पहले अपनी नीयत और अपना माल पाक कर लें।
لَبَّيْكَ اللّٰهُمَّ لَبَّيْكَ، لَبَّيْكَ لَا شَرِيكَ لَكَ لَبَّيْكَ، إِنَّ الْحَمْدَ وَالنِّعْمَةَ لَكَ وَالْمُلْكَ، لَا شَرِيكَ لَكَ
उच्चारण Labbaik Allāhumma labbaik, labbaika lā sharīka laka labbaik, innal-ḥamda wan-niʿmata laka wal-mulk, lā sharīka lak.
अर्थ हाज़िर हूँ ऐ अल्लाह, हाज़िर हूँ। हाज़िर हूँ, तेरा कोई शरीक नहीं, हाज़िर हूँ। सारी तारीफ़, सारी नेमतें और सारी बादशाही तेरी है। तेरा कोई शरीक नहीं।
इस्लाम में हज का एक संक्षिप्त इतिहास
- हनफ़ी किताबों के मुताबिक़ हज हिजरत के 9वें साल फ़र्ज़ हुआ (दूसरी राएँ इससे पहले बताती हैं)।
- 6 हिजरी में नबी ﷺ लगभग 1,500 सहाबा के साथ उमरे के लिए निकले मगर हुदैबिया में रोक दिए गए, जहाँ मशहूर संधि हुई।
- 7 हिजरी में वे लौटे और क़ज़ा उमरा (उमरतुल-क़ज़ा) अदा किया।
- 8 हिजरी में, रमज़ान में, मक्का मुसलमानों के लिए फ़तह हुआ और काबा के गिर्द के बुत हटा दिए गए।
- 10 हिजरी में नबी ﷺ ने एलान किया कि आप हज करेंगे। आप 25 ज़िलक़ादा को अपनी पत्नियों के साथ मदीना से रवाना हुए, और सहाबा की एक बड़ी तादाद आपके पीछे हो ली। यह हज हज्जतुल-इस्लाम, हज्जे-अकबर और हज्जतुल-विदा (विदाई का हज) के नाम से जाना जाता है। यही वह नमूना है जिसकी हर हाजी पैरवी करता है, और अरफ़ात का इसका ख़ुतबा इस्लामी इतिहास के सबसे अहम ख़ुतबों में से है। आपने इसे क़ारिन के तौर पर अदा किया, इसीलिए हनफ़ी मसलक में क़िरान को सबसे बेहतर तरीक़ा माना जाता है।

हज किस पर फ़र्ज़ है: फ़र्ज़ियत की शर्तें
हज उस शख़्स पर फ़र्ज़ होता है जिसमें ये सारी शर्तें पाई जाएँ:
| शर्त | इसका मतलब |
|---|---|
| इस्लाम | ग़ैर-मुस्लिम पर ज़रूरी नहीं। |
| बालिग़ होना (बुलूग़) | बच्चे पर फ़र्ज़ नहीं। बच्चे का हज सही है और उस पर सवाब मिलता है, लेकिन बालिग़ होने के बाद उसे दोबारा हज करना होगा। |
| अक़्ल का ठीक होना | जो शख़्स अक़्ल के ठीक न हो उस पर फ़र्ज़ नहीं। |
| आज़ाद होना | तारीख़ी तौर पर ग़ुलाम पर फ़र्ज़ नहीं था। |
| इस्तिताअत (istita'ah) | वहाँ जाने-आने का ज़रिया, काफ़ी तोशा, महफ़ूज़ रास्ता, और इतनी सेहत होना (या मदद करने वाला कोई होना)। |
इस्तिताअत में शामिल है:
- आने-जाने का किराया।
- सफ़र का तोशा और ख़र्च, और अपनी ग़ैरमौजूदगी में घर पर जिनकी कफ़ालत उसके ज़िम्मे है उनके लिए काफ़ी इंतज़ाम।
- ऐसा सफ़र जो जाने-आने में मुनासिब हद तक महफ़ूज़ हो।
- सफ़र की इजाज़त देने वाली जिस्मानी सेहत।
- वहाँ पहुँचने और मनासिक पूरे करने के लिए काफ़ी वक़्त।
किसी की तरफ़ से हज (हज्जे-बदल)। जो शख़्स साधन रखता हो लेकिन हमेशा के लिए सफ़र से मजबूर हो, ऐसी बीमारी की वजह से जिससे शिफ़ा की उम्मीद न हो या बहुत बुढ़ापे की वजह से, उसे चाहिए कि अपनी तरफ़ से किसी को हज के लिए भेजे। जो शख़्स हज फ़र्ज़ होने के बाद उसे अदा किए बिना मर जाए, वह वसीयत कर जाए कि उसके तरके से हज करवाया जाए। बेहतर यह है कि बदली हज करने वाला पहले अपना हज कर चुका हो।
औरतों के लिए अतिरिक्त शर्त। औरत के साथ सफ़र में उसका शौहर या कोई महरम होना ज़रूरी है। देखें अध्याय 15।
हज का सवाब
- आपको "अल्लाह के मेहमान" (ज़ुयूफ़ुर्रहमान) का दर्जा मिलता है।
- आपको बड़ा सवाब मिलता है।
- आप यहूदी या ईसाई मरने से बच जाते हैं, यह उस शख़्स के लिए चेतावनी है जिसने हज की ताक़त होते हुए हज नहीं किया।
- आपको हाजियों के लिए नबी ﷺ की मग़फ़िरत की दुआ की शफ़ाअत मिलती है।
- आप नवजात बच्चे की तरह पाक हो जाते हैं।
- यह जिहाद की बेहतरीन क़िस्मों में से है।
- मक़बूल हज का बदला जन्नत के सिवा कुछ नहीं।
الْحَجُّ الْمَبْرُورُ لَيْسَ لَهُ جَزَاءٌ إِلَّا الْجَنَّةُ
उच्चारण Al-ḥajjul-mabrūru laisa lahu jazā'un illal-jannah.
अर्थ मब्रूर (मक़बूल) हज का बदला जन्नत के सिवा कुछ नहीं।
हदीस, बुख़ारी और मुस्लिम में रिवायत है
مَنْ حَجَّ لِلّٰهِ فَلَمْ يَرْفُثْ وَلَمْ يَفْسُقْ رَجَعَ كَيَوْمِ وَلَدَتْهُ أُمُّهُ
उच्चारण Man ḥajja lillāhi fa lam yarfuth wa lam yafsuq rajaʿa ka yawmi waladat-hu ummuh.
अर्थ जिसने अल्लाह के लिए हज किया, और बेहूदगी व गुनाह से बचा रहा, वह उस दिन की तरह लौटता है जिस दिन उसकी माँ ने उसे जना था।
हदीस, बुख़ारी और मुस्लिम में रिवायत है
दुनिया में फ़ायदे
- दुनिया भर के मुसलमान एक-दूसरे से मिलते हैं।
- तिजारत और अर्थव्यवस्था को फ़ायदा होता है।
- सब मुसलमानों की बराबरी ज़ाहिर होती है।
आख़िरत के फ़ायदे
- अपने आपको इबादत के लिए वक़्फ़ करने की तरबियत।
- मुस्लिम शख़्सियत बनाने की तरबियत।
- इस दुनिया से रुख़्सत होने के लिए तैयार रहने की तरबियत।
- काबा को देखने का सवाब।
- हर अमल को सिर्फ़ अल्लाह के लिए ख़ालिस करने की तरबियत।
- फ़रिश्तों के सामने अल्लाह की तरफ़ से तारीफ़ पाना।
- हज्जे-मब्रूर पाना।
हज को मब्रूर क्या बनाता है
| दर्जा | बयान |
|---|---|
| हाजी मब्रूर | सबसे ऊँचा और बेहतरीन हज: इसके सारे गुनाह माफ़ होते हैं, हाजी ज़िंदगी भर इबादत पर क़ायम रहता है, और जन्नत का वादा है। |
| हाजी मक़बूल | सही हज, जिसमें हाजी के गुनाह माफ़ होते हैं। |
| हाजी मरदूद | वह हज जो क़बूल नहीं होता, शर्तों और अरकान में कमी की वजह से, या दूसरी वजहों से। |
जाने से पहले
- अपनी नीयत सिर्फ़ अल्लाह के लिए रखें, किसी उपाधि, तस्वीरों या तारीफ़ के लिए नहीं।
- मनासिक अच्छी तरह सीखें और हलाल ज़राए से काफ़ी रक़म साथ लें, अपने ज़िम्मे की ज़कात अदा करने के बाद।
- यह पक्का कर लें कि आप इस्लाम के दूसरे स्तंभों, ख़ासकर पाँच वक़्त की नमाज़, को पहले से अच्छी तरह अदा कर रहे हैं।
हज के दौरान
- हर फ़र्ज़ और वाजिब अमल सही तरह अदा करें।
- एहराम की पाबंदियों का एहतराम करें, और जो दम (जुर्माना) लाज़िम हो उसे अदा करें।
- रफ़स (अश्लील बात), फ़ुसूक़ (गुनाह) और जिदाल (झगड़ा) से बचें, सूरह अल-बक़रा 2:197।
लौटने के बाद
- गुनाह और ज़्यादती से दूर रहें।
- और नेक अमल करें, ताकि आपका ईमान बढ़ता रहे।
- अपने अख़लाक़ और बर्ताव को ज़िंदगी भर लगातार बेहतर बनाते रहें।

اللّٰهُمَّ اجْعَلْهُ حَجًّا مَبْرُورًا، وَسَعْيًا مَشْكُورًا، وَذَنْبًا مَغْفُورًا، وَعَمَلًا صَالِحًا مَقْبُولًا، وَتِجَارَةً لَنْ تَبُورَ
उच्चारण Allāhummajʿalhu ḥajjan mabrūrā, wa saʿyan mashkūrā, wa dhanban maghfūrā, wa ʿamalan ṣāliḥan maqbūlā, wa tijāratan lan tabūr.
अर्थ ऐ अल्लाह, इसे मक़बूल हज बना दे, क़द्र किया जाने वाला प्रयास, बख़्शे हुए गुनाह, क़बूल होने वाले नेक अमल, और ऐसी तिजारत जो कभी घाटे में न जाए।
यह गाइड कैसे तरतीब दी गई है
अध्याय उसी क्रम में हैं जिसमें आपको उनकी ज़रूरत पड़ेगी:
- 1 · मायने, फ़र्ज़ियत और सवाब, यही अध्याय।
- 2 · एक नज़र में हज, पूरा सफ़र एक तस्वीर में।
- 3 · अपने दिल और अपने मामलात की तैयारी।
- 4 · मुक़द्दस सरज़मीन, मक्का, काबा और हज के मक़ामात।
- 5 · फ़र्ज़, वाजिब और हज अदा करने के तीन तरीक़े।
- 6–10 · ख़ुद मनासिक: एहराम, उसकी पाबंदियाँ और जुर्माने, तवाफ़, सई और बाल कटवाना और एहराम से निकलना।
- 11–13 · हज के दिन: अरफ़ात, मुज़दलिफ़ा और मिना और जमरात।
- 14 · उमरा चरण-दर-चरण।
- 15–17 · औरतों के मसाइल, पाकी और नमाज़, और सेहत और हिफ़ाज़त।
- 18 · तवाफ़े-विदा और मदीना की ज़ियारत।
- 19 · योजना और व्यावहारिक बातें।
अध्याय 2
एक नज़र में हज: पूरा सफ़र, दिन-ब-दिन
हर अमल को तफ़सील से सीखने से पहले पूरा सफ़र एक जगह देख लें: आप कहाँ जाते हैं, किस दिन, और वहाँ क्या करते हैं, घर से निकलने से लेकर हाजी बनकर लौटने तक।

पूरा सफ़र एक तस्वीर में
हज के मनासिक पाँच या छह दिन चलते हैं, 8 से 12 या 13 ज़िलहिज्जा तक, इस्लामी कैलेंडर का बारहवाँ महीना। ज़्यादातर हाजी चार से सात हफ़्ते घर से दूर रहते हैं, क्योंकि उड़ानें हज से हफ़्तों पहले सऊदी अरब पहुँचती हैं और हज के हफ़्तों बाद रवाना होती हैं।
हरम से बाहर का हाजी आम तौर पर इन दो में से किसी एक तरह सफ़र करता है:
- पहले मक्का: जद्दा की उड़ान, मीक़ात (क़र्नुल-मनाज़िल) से पहले हवाई जहाज़ में एहराम, सीधे मक्का उमरे के लिए, हज से पहले के हफ़्ते मक्का में, फिर हज, फिर लगभग आठ दिन मदीना में, और वहीं से रवानगी।
- पहले मदीना: मदीना की उड़ान, वहाँ लगभग आठ दिन, फिर मक्का के रास्ते में ज़ुल-हुलैफ़ा (बिरे-अली) के मीक़ात पर एहराम। हज के बाद वापसी की उड़ान जद्दा से होती है।

हज के दिन
8 तारीख़ से पहले: उमरा और मक्का में इंतज़ार
ज़्यादातर हाजी तमत्तु (अध्याय 5) करते हैं: वे उमरे के एहराम में पहुँचते हैं, उमरा पूरा करके एहराम खोल देते हैं, और हज तक मक्का में आम ज़िंदगी गुज़ारते हैं। क़िरान करने वाले उमरे के बाद एहराम में ही रहते हैं; इफ़राद करने वाले मीक़ात से ही एहराम में होते हैं। वक़्त को अच्छी तरह इस्तेमाल करें, मगर अपनी ताक़त बचाकर रखें।
ज़िलहिज्जा की 8 तारीख़, यौमे-तरविया
- ग़ुस्ल करें, एहराम पहनें, और अपने ठिकाने पर हज की नीयत करके तलबिया पढ़ें (क़िरान और इफ़राद वाले पहले से एहराम में हैं)।
- सुन्नत के मुताबिक़ मिना जाएँ, वहाँ पाँचों नमाज़ें अपने-अपने वक़्त पर पढ़ें और रात गुज़ारें, या अपने समूह का कार्यक्रम मानें अगर वह सीधे अरफ़ात ले जाता है।
9 तारीख़, यौमे-अरफ़ा
- सूरज निकलने के बाद अरफ़ात जाएँ।
- ज़वाल से आप वुक़ूफ़ में होते हैं, जो हज का सबसे अहम रुक्न है: "हज अरफ़ा है।"
- अगर आप हज के इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ते हैं तो ज़ुहर और अस्र ज़ुहर के वक़्त में मिलाकर पढ़ी जाती हैं, मुसाफ़िर के लिए दो-दो रकअत क़सर के साथ। अगर आप अपने ख़ेमे में पढ़ते हैं तो हर नमाज़ अपने वक़्त पर पढ़ें (अध्याय 11)।
- दोपहर के बाद का वक़्त सूरज डूबने तक दुआ, ज़िक्र, इस्तिग़फ़ार, क़ुरआन और तलबिया में गुज़ारें।
- सूरज डूबने के बाद मुज़दलिफ़ा के लिए रवाना हों। अरफ़ात में मग़रिब की नमाज़ न पढ़ें।
10 की रात, मुज़दलिफ़ा
- एहराम की हालत में मग़रिब और इशा इशा के वक़्त में एक साथ पढ़ें।
- रात गुज़ारें; फ़ज्र के बाद मुज़दलिफ़ा का वुक़ूफ़ (वाजिब) करें, जब तक आसमान ख़ूब रौशन न हो जाए।
- रमी के लिए कंकरियाँ जमा करें।
- सूरज निकलने से पहले मिना के लिए रवाना हों।
10 तारीख़, यौमुन्नहर (ईदुल-अज़हा)
इस दिन की सुन्नत तरतीब:
- सात कंकरियों से जमरए-अक़बा की रमी करें।
- क़ुर्बानी (दमे-शुक्र) क़िरान और तमत्तु वालों के लिए।
- बाल मुंडवाएँ या कटवाएँ: पहला तहल्लुल: पत्नी/पति से ताल्लुक़ के सिवा सब कुछ जायज़ हो जाता है।
- मक्का में तवाफ़े-ज़ियारत (और हज की सई अगर अभी नहीं की), 10, 11 या 12 तारीख़ को, दूसरा तहल्लुल।
11, 12 और 13 तारीख़, मिना में अय्यामे-तशरीक़
- रातें मिना में गुज़ारें (हनफ़ी मसलक में सुन्नत है)।
- हर दिन ज़वाल के बाद तीनों जमरात की रमी क्रम से करें: सुग़रा, वुस्ता, कुबरा, हर एक पर सात कंकरियाँ।
- आप 12 को रमी के बाद रवाना हो सकते हैं, बेहतर है सूरज डूबने से पहले; अगर 13 की सुबह-सादिक़ आपके मिना में रहते हुए हो जाए तो आपको 13 को भी रमी करनी होगी।

हज के बाद
- अगर तवाफ़े-ज़ियारत अभी नहीं हुआ तो अब, उसके वक़्त में, कर लें।
- हमेशा के लिए मक्का छोड़ने से पहले तवाफ़े-विदा करें।
- मदीना की ज़ियारत करें, मस्जिदे-नबवी में नमाज़ पढ़ें, और नबी ﷺ पर सलाम भेजें।
फ़र्ज़, वाजिब और सुन्नत
| दर्जा | अगर छूट जाए… |
|---|---|
| फ़र्ज़ (रुक्न) | हज सही नहीं होता। अरफ़ात का वुक़ूफ़ छूटने का मतलब उस साल का हज छूट जाना है। |
| वाजिब | हज सही रहता है, मगर दम या सदक़ा लाज़िम होता है, और जान-बूझकर छोड़ना गुनाह है। |
| सुन्नत | कोई जुर्माना नहीं, मगर सवाब चला जाता है। |
याद रखने की छह बातें
- हज अरफ़ा है। कुछ भी हो, 9 के ज़वाल और 10 की सुबह-सादिक़ के बीच अरफ़ात की हदों के अंदर रहें, और सूरज डूबने तक ठहरें।
- अपने एहराम की हिफ़ाज़त करें। पाबंदियाँ नीयत और तलबिया के वक़्त से लागू हो जाती हैं (अध्याय 7)।
- यक़ीन के साथ गिनें। तवाफ़ के सात चक्कर, सई के सात चक्कर।
- वक़्त का ध्यान रखें। 11 और 12 को रमी सिर्फ़ ज़वाल के बाद होती है।
- अपने समूह के साथ रहें। अपना कैंप, ख़ेमे का नंबर और ठिकाना जानें।
- सब्र रखें। गर्मी, भीड़, क़तारें और थकान हज का हिस्सा हैं।

अध्याय 3
अपने दिल और अपने मामलात की तैयारी
हज एयरपोर्ट से बहुत पहले शुरू हो जाता है। कोर्स अपना पहला हफ़्ता अंदरूनी सफ़र पर लगाता है: ख़ालिस नीयत, तौबा, मामलात की दुरुस्ती, किरदार की सफ़ाई, और उन अंधविश्वासों की पहचान जो चुपके से हज को ख़राब कर सकते हैं।

रवानगी से पहले दस आदाब
कोर्स हज या उमरे की तैयारी करने वाले हर शख़्स के लिए दस आदाब बताता है:
- ख़ालिस नीयत, जिसमें सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा चाही जाए।
- सच्ची तौबा (तौबा-ए-नसूह): गुनाह छोड़ना, उस पर पछताना, दोबारा न करने का अज़्म करना, और, जहाँ दूसरों से जुड़ा हो, उनके हक़ लौटाना।
- अपने हज पर सिर्फ़ हलाल माल ख़र्च करें।
- सफ़र के लिए काफ़ी तोशा और रक़म साथ लें, और जिनकी कफ़ालत आपके ज़िम्मे है उनके लिए काफ़ी छोड़ जाएँ।
- ऐसे साथी चुनें जो आपको याद दिलाएँ, आपकी मदद करें और आपको सही राह पर रखें।
- दुआ और ज़िक्र को अभी से अपनी रोज़ाना ज़िंदगी का हिस्सा बनाएँ, सिर्फ़ मक्का में नहीं।
- अपनी वसीयत लिखें (वसीयत)।
- माफ़ी माँगें और माफ़ करें, और सबके बारे में साफ़ दिल लेकर रवाना हों।
- दिल को पाक करें: पसंदीदा सिफ़ात (महमूदा) अपनाएँ और नापसंदीदा सिफ़ात (मज़मूमा) निकालें।
- साबित-क़दम रहें (इस्तिक़ामत) और हज व उमरा अदा करने का तरीक़ा सीखने में संजीदा रहें।
नफ़्स का तज़्किया (तज़्कियतुन-नफ़्स)
हाजी की असल तैयारी वह दिल है जो अपने रब से मिलने को तैयार हो। कोर्स ये बातें सुझाता है:
- दुरुस्त अक़ीदा (अक़ीदा) और शरीअत पर सही अमल।
- इस्लाम का इल्म और समझ।
- पाँच वक़्त की नमाज़, वक़्त पर, जो हाजी घर पर नमाज़ में सुस्ती करता है, उसके लिए मक्का की भीड़ में उसकी हिफ़ाज़त करना मुश्किल होगा।
- नफ़्ली इबादत:
- रात की नमाज़ (क़ियामुल्लैल) और तौबा की नमाज़;
- सदक़ा, माल का, मेहनत का या मीठे बोल का;
- दुआ और ज़िक्र की कसरत;
- क़ुरआन की तिलावत;
- हर तरह के भलाई के काम।
- ज़्यादा हँसी-मज़ाक़ और फ़ुज़ूल बातों (लग़्व) से बचना।
जो सिफ़ात अपनानी हैं और जो पीछे छोड़नी हैं
हज आपको भीड़, गर्मी और क़तारों में हर क़ौम के लोगों के साथ रखता है। आपके किरदार का इम्तिहान होगा, अक्सर दिन में कई बार। अभी से उस पर काम करें।
| पसंदीदा (महमूदा) | नापसंदीदा (मज़मूमा) |
|---|---|
| तौबा; अल्लाह को याद रखना | अल्लाह और उसके रसूल ﷺ को भूल जाना |
| अमानतदारी | दुनिया की ज़रूरत से ज़्यादा मुहब्बत |
| सब्र और शुक्र | ख़ुदग़र्ज़ी |
| इख़लास और रज़ा | ग़ुस्सा |
| मेहनत और सख़ावत | घमंड (तकब्बुर) और दिखावा (रियाकारी, उज्ब) |
| किफ़ायत और दूसरों का ख़याल | फ़ुज़ूलख़र्ची |
| रहमदिली और दरगुज़र | झूठ और धोखा |
| एक-दूसरे की मदद | झगड़ा और गाली-गलौज |
| वादे और वक़्त की पाबंदी | ग़ीबत |
| ज़िम्मेदारी और ख़ुद-एतिमादी | कंजूसी |
| इस्तिक़ामत | हसद और कीना |
| हमेशा सच बोलना | ख़ियानत |
| साफ़-सफ़ाई का ख़याल | गंदगी और लापरवाही |
| नरमी | फ़ुज़ूल बातें और काम; दूसरों से बदगुमानी |
मुक़द्दस सरज़मीन में आदाब
वहाँ पहुँचकर याद रखें कि आप अल्लाह के घर में मेहमान हैं। कोर्स के बताए हरम के आदाब:
- अल्लाह पर भरोसा रखें, लोगों पर नहीं।
- याद रखें कि आप अल्लाह के मेहमान हैं।
- बेहतरीन अख़लाक़ दिखाएँ।
- याद रखें कि पूरा सफ़र इबादत है, छुट्टी नहीं।
- जो कुछ मिले उस पर शुक्रगुज़ार और क़ानेअ रहें: कमरा, खाना, बस।
- बुरे अल्फ़ाज़ और बुरे कामों से दूर रहें।
- तकब्बुर से बचें।
- दूसरे हाजियों से बहस न करें और उन्हें तकलीफ़ न दें, वे भी अल्लाह के मेहमान हैं।
- अफ़वाहें और बिना तस्दीक़ की कहानियाँ न फैलाएँ।
- अपना वक़्त इबादत से भरें: तवाफ़, क़ुरआन, एतिकाफ़, दुआ, तौबा और इस्तिग़फ़ार।
- दूसरों की मदद और तआवुन करें।
जिन अंधविश्वासों से बचना है (ख़ुराफ़ात)
सालों में ऐसी बातें हज से जुड़ गई हैं जिनकी इस्लाम में कोई बुनियाद नहीं। कुछ सिर्फ़ पैसा बर्बाद करती हैं; कुछ शिर्क, अल्लाह के साथ किसी को शरीक ठहराना, तक पहुँच जाती हैं और आदमी के ईमान को नुक़सान पहुँचा सकती हैं। कोर्स इन्हें ख़ास तौर पर नाम लेकर बताता है ताकि हाजी इन्हें पहचानें:
| रिवाज | उसके पीछे की ग़लत मान्यता |
|---|---|
| काबा के ग़िलाफ़ (किस्वा) के टुकड़े लेना | कि इससे बरकत होती है या कारोबार चमकता है |
| जायनमाज़ के तौर पर इस्तेमाल हुआ सफ़ेद कपड़ा अपने कफ़न के लिए घर ले जाना | कि इससे क़ब्र का अज़ाब हल्का होता है |
| मिना से चावल की खुरचन, या अरफ़ात में धूप में सुखाए चावल घर ले जाना | कि इससे कारोबार चमकता है या क़िस्मत खुलती है |
| मस्जिदे-हराम के सुतूनों से लिपटना | कि इससे उम्र लंबी होती है या दौलत आती है |
| ज़रूरतें माँगने के लिए काबा के ग़िलाफ़ से चिपटना | अल्लाह से माँगने की जगह काबा से माँगना |
| तवाफ़ के दौरान किस्वा के नीचे पैसे रखकर बाद में वापस ले लेना | कि वह रक़म कारोबार की "बीज-पूँजी" बन जाती है |
| सफ़र से पहले घर पर शहादत लिखा काग़ज़ छोड़ जाना | कि इससे आदमी मुक़द्दस सरज़मीन में मरने से बच जाता है |
| तावीज़ और गंडे पहनना | कि वे आपकी हिफ़ाज़त करते हैं |
| रवानगी से पहले घर की "हिफ़ाज़त" के लिए बोमोह (ओझा) बुलाना | कि इससे आफ़त टल जाती है |
| तवाफ़ के दौरान सात कुओं का पानी लेकर दवा बनाना | कि इससे शिफ़ा होती है |
| मक्का में किसी "शेख़" से आपके हज की तस्दीक़ और नया नाम देने वाला सर्टिफ़िकेट ख़रीदना | कि इससे आपका हज मान्य हो जाता है |
| मस्जिदे-हराम की झाड़ुओं की तीलियाँ ले जाना | कि उनसे बरकत मिलती है |
| दोनों मुक़द्दस मस्जिदों के दरवाज़ों को मलना और सहलाना | कि इससे बरकत मिलती है |
| ज़मज़म, किशमिश, खजूर या पैसे तवाफ़ में साथ ले जाना ताकि वे "दवा" या "बीज-पूँजी" बन जाएँ | कि तवाफ़ उन्हें तावीज़ बना देता है |
| अरफ़ात में सात पत्थर दबाना | कि वे जहन्नम के सात दरवाज़े बंद कर देंगे |
| अरफ़ात में चुपके से रस्सियाँ काटना | कि इससे बच्चे का रोना रुकता है या ग्राहक आते हैं |
| बच्चे के पहले क़दमों के लिए अरफ़ात की रेत ले जाना | कि बच्चा मशहूर, सेहतमंद या बहादुर बनेगा |
जो बातें शहादत को तोड़ देती हैं
क्योंकि कुछ अंधविश्वास फिसलकर शिर्क तक पहुँच जाते हैं, कोर्स उन बातों की भी फ़ेहरिस्त देता है जो ईमान की गवाही (शहादत) को तोड़ देती हैं:
- इबादत में अल्लाह सुब्हानहु व तआला के साथ किसी को शरीक ठहराना।
- अपने और अल्लाह के बीच किसी चीज़ को वसीला बना लेना।
- मुशरिकीन को काफ़िर न समझना।
- यह मानना कि किसी और मज़हब की तालीम इस्लाम के बराबर है या उससे बेहतर है।
- उस चीज़ से नफ़रत करना जिसे रसूल ﷺ ने अपनी शरीअत के तौर पर क़ायम किया।
- अल्लाह सुब्हानहु व तआला, उसकी किताब, या उसके दीन की किसी भी चीज़ का मज़ाक़ उड़ाना।
- जादू पर यक़ीन रखना और उसे करना, या जिन्नात से दोस्ती करना।
- मुशरिकीन की मुसलमानों के ख़िलाफ़ लड़ाई में मदद करना।
- यह मानना कि कुछ लोगों को मुहम्मद ﷺ की शरीअत पर न चलने की इजाज़त है।
- अल्लाह सुब्हानहु व तआला के दीन से मुँह मोड़ लेना, या उस चीज़ से जो मुसलमान होने की क़तई शर्त है।
अपना तौहीद ख़ालिस रखें: यही वह बुनियाद है जिस पर पूरा हज खड़ा है।
दुनियावी मामलात निपटाना
- क़र्ज़: जो वाजिबुल-अदा है अदा करें, या अपने क़र्ज़ख़्वाह की रज़ामंदी लें और तफ़सील वसीयत में लिख दें।
- वसीयत और तरका: अपने घरवालों को बताएँ कि आपके काग़ज़ात कहाँ हैं। अपनी ग़ैरमौजूदगी में अपने मामलात सँभालने के लिए किसी को मुक़र्रर करें।
- घर-परिवार: बच्चों और बुज़ुर्ग वालिदैन की देखभाल का इंतज़ाम करें और पूरी मुद्दत के लिए काफ़ी ख़र्च (नफ़क़ा) छोड़ जाएँ।
- काम: अपनी छुट्टी पहले से अच्छी तरह तय कर लें, आप छह या सात हफ़्ते बाहर रह सकते हैं।
- सेहत: अपनी मेडिकल जाँच जल्दी पूरी कर लें और सफ़र से पहले किसी भी परेशानी का इलाज करा लें (देखें अध्याय 17)।
- इल्म: अपने हज कोर्स के हर सत्र में और अमली अभ्यास (अमली) में शामिल हों। सवाल अभी पूछ लें, बीस लाख की भीड़ में पूछना बहुत मुश्किल होता है।
سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَٰذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ، وَإِنَّا إِلَىٰ رَبِّنَا لَمُنْقَلِبُونَ
उच्चारण Subḥānal-ladhī sakh-khara lanā hādhā wa mā kunnā lahu muqrinīn, wa innā ilā rabbinā lamunqalibūn.
अर्थ पाक है वह ज़ात जिसने इसे हमारे वश में कर दिया, वरना हम इसे वश में करने वाले न थे; और हमें अपने रब की तरफ़ ज़रूर लौटकर जाना है।
सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़ 43:13–14
अध्याय 4
मुक़द्दस सरज़मीन: मक्का, काबा और हज के मक़ामात
आदम और इब्राहीम से लेकर नबी ﷺ तक मक्का की कहानी, काबा के वे हिस्से जिन्हें आप तवाफ़ में देखेंगे, हरम की फ़ज़ीलतें, वे जगहें जहाँ दुआ क़बूल होती है, ज़मज़म का कुआँ, और अरफ़ात, मुज़दलिफ़ा व मिना का भूगोल।

आदम और हव्वा: पहली मुलाक़ात
कोर्स मुक़द्दस सरज़मीन के इतिहास की शुरुआत आदम और हव्वा (Eve) से करता है। रिवायत में जन्नत से निकलने के बाद उनकी मुलाक़ात को अरफ़ात के मैदान से जोड़ा जाता है, और उलमा इससे दो सबक़ लेते हैं। पहला, तौबा: दो इंसान जिन्हें अपने गुनाह का एहसास था अल्लाह की तरफ़ पलटे और माफ़ किए गए, ठीक वही चीज़ जो हाजी अरफ़ात में चाहता है। दूसरा, दुश्मन: इब्लीस के वसवसे आदमी तक कहीं भी पहुँच सकते हैं, यहाँ तक कि सबसे मुक़द्दस जगहों में भी।
उनके बेटों क़ाबील और हाबील की कहानी, जिन्होंने हर एक ने क़ुर्बानी पेश की, एक ने अनाज की, एक ने मेंढे की, सूरह अल-माइदा (5:27–31) में बयान हुई है। इसे पहली क़ुर्बानी के तौर पर याद किया जाता है, उस क़ुर्बानी की जड़ जो हाजी और दुनिया भर के मुसलमान ईदुल-अज़हा पर करते हैं।
इब्राहीम, हाजरा और इस्माईल
मक्का, जैसा हम उसे जानते हैं, एक ख़ानदान से शुरू होता है। इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म से अपनी पत्नी हाजरा और उनके शीरख़्वार बेटे इस्माईल को अल्लाह के पाक घर की जगह के पास एक बंजर वादी में छोड़ा, जहाँ न खेती थी न पानी। उन्होंने दुआ की:
رَبَّنَا إِنِّي أَسْكَنتُ مِن ذُرِّيَّتِي بِوَادٍ غَيْرِ ذِي زَرْعٍ عِندَ بَيْتِكَ الْمُحَرَّمِ رَبَّنَا لِيُقِيمُوا الصَّلَاةَ فَاجْعَلْ أَفْئِدَةً مِّنَ النَّاسِ تَهْوِي إِلَيْهِمْ وَارْزُقْهُم مِّنَ الثَّمَرَاتِ لَعَلَّهُمْ يَشْكُرُونَ
उच्चारण Rabbanā innī askantu min dhurriyyatī bi wādin ghairi dhī zarʿin ʿinda baitikal-muḥarram, rabbanā liyuqīmuṣ-ṣalāta fajʿal af'idatan minan-nāsi tahwī ilaihim warzuqhum minath-thamarāti laʿallahum yashkurūn.
अर्थ ऐ हमारे रब, मैंने अपनी औलाद में से कुछ को एक बिना खेती की वादी में तेरे हुरमत वाले घर के पास बसाया है, ऐ हमारे रब, ताकि वे नमाज़ क़ायम करें। तो तू लोगों के दिल उनकी तरफ़ माइल कर दे, और उन्हें फलों से रोज़ी दे, ताकि वे शुक्र करें।
सूरह इब्राहीम 14:37
हर हाजी उस दुआ का जवाब है: ज़मीन के कोने-कोने से दिल आज भी इस वादी की तरफ़ खिंचे चले आते हैं।
कहानी हज के मनासिक में जारी रहती है:
- सई: जब पानी ख़त्म हो गया और इस्माईल प्यास से रोने लगे, तो हाजरा सफ़ा और मरवा की पहाड़ियों के बीच सात बार दौड़ीं, तलाश करती और दुआ करती हुईं। हाजी आज भी उसी राह पर चलते हैं (अध्याय 9)।
- ज़मज़म: सातवें चक्कर के बाद, जहाँ इस्माईल ने रेत पर एड़ी मारी थी वहाँ से पानी फूट पड़ा। हाजरा ने उसके गिर्द मेंड़ बना दी (तज़मज़मा) ताकि वह बह न जाए, इसी से नाम ज़मज़म पड़ा, और कुआँ तब से बहता चला आ रहा है।
- क़ुर्बानी: जब इस्माईल 13 साल के थे, इब्राहीम मक्का आए और ख़्वाब में उन्हें बेटे को ज़बह करने का हुक्म मिला। बाप-बेटे दोनों ने सर झुका दिया, और अल्लाह ने इस्माईल का फ़िदया एक बड़ी क़ुर्बानी से दिया (सूरह अस-साफ़्फ़ात 37:102–111)।
- कंकरियाँ मारना: इब्लीस ने इब्राहीम को बहकाने और अल्लाह की इताअत से फेरने की कोशिश की, और इब्राहीम ने उसे उन्हीं जगहों पर पत्थर मारकर भगाया जहाँ अब जमरात खड़े हैं (अध्याय 13)।
- काबा: इब्राहीम और इस्माईल ने बाद में मिलकर घर की बुनियादें उठाईं (सूरह अल-बक़रा 2:127)।
जुरहुम से क़ुरैश तक
- वादी क़ाफ़िलों के रास्ते पर थी, और जुरहुम क़बीले ने, पानी के ऊपर चक्कर लगाती चिड़ियों को देखकर, हाजरा से वहाँ बसने की इजाज़त माँगी। इस्माईल उनके बीच पले-बढ़े और उसी क़बीले में उनका निकाह हुआ।
- जुरहुम ने लगभग दो सदियों तक मक्का पर हुकूमत की, फिर यमन से आए ख़ुज़ाआ ने उन्हें हरा दिया।
- क़ुसई बिन किलाब ने बाद में अरब क़बीलों को क़ुरैश क़बीले में मिला दिया, जो काबा के निगहबान बने।
- नबी मुहम्मद ﷺ मक्का में अपने दादा अब्दुल-मुत्तलिब की सरदारी के दौरान पैदा हुए।
- 8 हिजरी के रमज़ान में नबी ﷺ मक्का में दाख़िल हुए, पाक घर पर मुशरिकों की हुकूमत ख़त्म की और उसे बुतों से पाक किया।
काबा
कोर्स घर के इतिहास का ख़ुलासा यूँ देता है:
- यह ज़मीन पर क़ायम हुआ इबादत का पहला घर है (सूरह आले-इमरान 3:96)।
- इसके निर्माण के पत्थर पाँच पहाड़ों से आए बताए जाते हैं: जबले-लुबनान, तूरे-ज़ीता, तूरे-सीना, जबले-जूदी और जबले-हिरा।
- रिवायतें इब्राहीम से पहले की इमारतों का भी ज़िक्र करती हैं, फ़रिश्तों की, आदम की और शीस की बनाई हुई।
- इब्राहीम की बनाई इमारत की माप लगभग 14 मीटर ऊँचाई, 12 मीटर लंबाई और 11 मीटर चौड़ाई रिवायत की जाती है।
- क़ुरैश ने इसे दोबारा बनाया जब नबी ﷺ 35 साल के थे; आपने ख़ुद हजरे-असवद को उसके कोने में रखा और क़बीलों का झगड़ा निपटाया।
- कोर्स इसकी क्रमवार इमारतें दिखाता है, क़ुसई बिन किलाब, क़ुरैश, अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर और हज्जाज की, और बताता है कि नवीकरण और संरक्षण का काम बादशाह फ़हद के दौर से आज तक जारी है।
काबा के हिस्से
| हिस्सा | यह क्या है |
|---|---|
| हजरे-असवद (काला पत्थर) | पूर्वी कोने में चाँदी के फ़्रेम में जड़ा है। तवाफ़ इसी की सीध से शुरू और ख़त्म होता है। |
| रुक्ने-इराक़ी | उत्तरी कोना, इराक़ की तरफ़। |
| रुक्ने-शामी | पश्चिमी कोना, शाम (सीरिया) की तरफ़। |
| रुक्ने-यमानी | दक्षिणी कोना, यमन की तरफ़। तवाफ़ में हाथ से इसे छूना सुन्नत है, अगर धक्का दिए बिना हो सके। |
| दरवाज़ा | उत्तर-पूर्वी दीवार पर, ज़मीन से लगभग दो मीटर ऊपर। |
| मुल्तज़म | हजरे-असवद और दरवाज़े के बीच की दीवार, दुआ क़बूल होने की जगह। |
| मीज़ाब (सुनहरा परनाला) | हिज्र के ऊपर छत के किनारे पर, बारिश का पानी निकालने के लिए। |
| हिज्रे-इस्माईल | काबा के उत्तर-पश्चिमी तरफ़ का अर्धवृत्ताकार हिस्सा। तवाफ़ इसके बाहर से होना चाहिए: तवाफ़ में इसे छूने या इसमें दाख़िल होने से वह चक्कर बेकार हो जाता है। |
| हतीम | नीची अर्धवृत्ताकार दीवार जो हिज्रे-इस्माईल को घेरती है। |
| शाज़रवान | दीवारों के नीचे ढलवाँ संगमरमर का आधार। यह काबा का हिस्सा है: तवाफ़ में इस पर न चलें। |
| किस्वा | सोने से क़ुरआन की आयतें कढ़ा हुआ काला रेशमी ग़िलाफ़, जो हर साल बदला जाता है। |
| मक़ामे-इब्राहीम | वह पत्थर जिस पर खड़े होकर इब्राहीम ने तामीर की, अब दरवाज़े के सामने सोने और शीशे के खोल में। |





मस्जिदे-हराम
- मस्जिदे-हराम पूरी मस्जिद है: काबा, मताफ़ (तवाफ़ की जगह) और उसके गिर्द की नमाज़ की दालानें।
- इब्राहीम के ज़माने से क़ुसई बिन किलाब तक यह घर के गिर्द एक खुली जगह थी, जिसमें कोई इमारत न थी।
- ख़लीफ़ा उमर ने इसे 17 हिजरी में और उस्मान ने 26 हिजरी में बढ़ाया। तब से इसे बार-बार बढ़ाया गया है; आज इसमें दस लाख से कहीं ज़्यादा नमाज़ी समा सकते हैं, और मसआ (सफ़ा और मरवा के बीच सई की गैलरी) इमारत का हिस्सा है।

मस्जिदे-हराम में नेक काम
- बहुत से नेक काम करें, ख़ासकर तवाफ़ और नमाज़।
- क़ुरआन पढ़ें।
- अल्लाह का ज़िक्र करें।
- नबी ﷺ पर दरूद (सलावात) भेजें।
- नापसंदीदा और बेफ़ायदा बातों से बचें।
- हर बार दाख़िल होते वक़्त एतिकाफ़ (इबादत के लिए मस्जिद में ठहरना) की नीयत करें।
हरम की फ़ज़ीलतें
मक्का का मुक़द्दस इलाक़ा (हरम की हदें), शहर के गिर्द एक वसीअ इलाक़ा, जिसकी हदें निशानों से बताई गई हैं, जिसकी फ़ज़ीलतें कोर्स गिनाता है:
- यह नबी ﷺ की जन्मभूमि है।
- यह इज़्ज़त, अमन और सुकून की जगह है।
- रिवायत है कि काबा पर रोज़ाना 120 रहमतें उतरती हैं: 60 तवाफ़ करने वालों के लिए, 40 नमाज़ पढ़ने वालों के लिए और 20 घर को देखने वालों के लिए।
- मस्जिदे-हराम में एक नमाज़ दूसरी जगहों की एक लाख नमाज़ों के बराबर है। बहुत से उलमा के नज़दीक यह इज़ाफ़ा पूरे हरम को शामिल है, सिर्फ़ मस्जिद की इमारत को नहीं, और वहाँ दूसरे नेक अमल भी बढ़ाकर लिखे जाते हैं।
- तवाफ़ के बाद की दो रकअतें दिन या रात के किसी भी वक़्त पढ़ी जा सकती हैं, मगर हनफ़ी मसलक में इन्हें मकरूह वक़्तों (सूरज निकलने, ठीक दोपहर और सूरज डूबने) के गुज़र जाने तक टाला जाता है (अध्याय 16)।
- मक्का ताऊन और दज्जाल से महफ़ूज़ है।
- यहाँ दुआ क़बूल होने की बहुत सी जगहें हैं।
दुआ क़बूल होने की पंद्रह जगहें
हसन बसरी के हवाले से, जैसा कोर्स में नक़ल है, दुआ क़बूल होती है:
- काबा के गिर्द पूरे तवाफ़ में
- मुल्तज़म पर
- काबा के अंदर
- ज़मज़म के कुएँ पर
- हिज्रे-इस्माईल में
- सफ़ा पर
- मरवा पर
- मसआ में (सई की जगह)
- मक़ामे-इब्राहीम के पीछे
- अरफ़ात में, पूरे वुक़ूफ़ के दौरान
- मुज़दलिफ़ा में, पूरी रात
- मिना में, क़ुर्बानी के दिन और अय्यामे-तशरीक़ में
- छोटे जमरे पर
- बीच वाले जमरे पर
- बड़े जमरे पर

ज़मज़म
ज़मज़म का कुआँ काबा से कुछ ही मीटर दूर है। आज पानी को दोनों मुक़द्दस मस्जिदों में लगे कूलरों और नलों तक पंप किया जाता है, और हाजियों को आम तौर पर सील-बंद डिब्बों में कुछ घर ले जाने की इजाज़त होती है।
ज़मज़म पीने के आदाब
- क़िबले की तरफ़ मुँह करें।
- बिस्मिल्लाह कहें।
- दाहिने हाथ से पिएँ।
- सुकून से, तीन साँसों में पिएँ।
- दुआ करें, "ज़मज़म जिस नीयत से पिया जाए उसी के लिए है"।
- नबी ﷺ ने ज़मज़म खड़े होकर भी पिया और बैठकर भी।
اللّٰهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْمًا نَافِعًا، وَرِزْقًا وَاسِعًا، وَشِفَاءً مِنْ كُلِّ دَاءٍ
उच्चारण Allāhumma innī as'aluka ʿilman nāfiʿā, wa rizqan wāsiʿā, wa shifā'an min kulli dā'.
अर्थ ऐ अल्लाह, मैं तुझसे नफ़ा देने वाला इल्म, वसीअ रिज़्क़ और हर बीमारी से शिफ़ा माँगता हूँ।
ज़मज़म की फ़ज़ीलतें
- यह शिफ़ा का ज़रिया है, लेकिन अपनी तजवीज़ की हुई दवाएँ वक़्त पर लेते रहें और अपने डॉक्टर की सलाह मानें। अल्लाह पर भरोसा (तवक्कुल) में यह भी शामिल है कि उसके दिए हुए असबाब को इस्तेमाल किया जाए।
- यह पीने वाले को ग़िज़ा देता और ताक़त पहुँचाता है।
- यह उस मक़सद को पूरा करता है जिसके लिए पिया जाए।
- यह क़ियामत तक सूखेगा नहीं।
- यह वह पानी है जिससे नबी ﷺ का दिल धोया गया।
- इसके फ़ायदों का वैज्ञानिक अध्ययन भी हुआ है।

خَيْرُ مَاءٍ عَلَى وَجْهِ الْأَرْضِ مَاءُ زَمْزَمَ، فِيهِ طَعَامٌ مِنَ الطُّعْمِ، وَشِفَاءٌ مِنَ السُّقْمِ
उच्चारण Khairu mā'in ʿalā wajhil-arḍi mā'u zamzam, fīhi ṭaʿāmun minaṭ-ṭuʿm, wa shifā'un minas-suqm.
अर्थ रूए-ज़मीन पर सबसे बेहतरीन पानी ज़मज़म का पानी है। उसमें खाने की सी ग़िज़ा है और बीमारी से शिफ़ा है।
हदीस, तबरानी में रिवायत है

हज के मक़ामात (अल-मशाइर)
मशाइर, "अल्लाह के दीन की निशानियाँ", वे जगहें हैं जहाँ हज के मुख्य मनासिक अदा होते हैं: अरफ़ात, मुज़दलिफ़ा और मिना। इनमें से दो, मुज़दलिफ़ा और मिना, हरम के अंदर हैं; अरफ़ात उसके ठीक बाहर है।
| मक़ाम | वहाँ क्या होता है | भूगोल (कोर्स से) |
|---|---|---|
| अरफ़ात | 9 ज़िलहिज्जा को वुक़ूफ़, हज का अहम रुक्न | जबले-रहमत की पहाड़ी वाला एक चौड़ा मैदान। मूल सड़क से मक्का से लगभग 21.9 किमी। इसकी हदें बड़े साइनबोर्डों से दर्शाई गई हैं। |
| मुज़दलिफ़ा | 10 की रात (मबीत); कंकरियाँ जमा करना | अरफ़ात और मिना के बीच, अरफ़ात से लगभग 8 किमी और मिना से लगभग 6.9 किमी। |
| मिना | जमरात की रमी; तशरीक़ की रातें और दिन | मक्का से लगभग 7 किमी। लगभग 1.1 किमी चौड़ा, बड़े जमरे के आसपास घटकर लगभग 500 मीटर, और बड़े जमरे से वादी मुहस्सिर तक लगभग 4.7 किमी लंबा। दोनों तरफ़ पहाड़ियाँ हैं, उनमें से एक जबल सुबैर है। |



मक्का में दूसरी जगहें जहाँ आप जा सकते हैं
बहुत से समूह मक्का के गिर्द ऐतिहासिक मक़ामात की एक छोटी ज़ियारत (ज़ियारत) का इंतज़ाम करते हैं। इनमें से कोई भी ज़ियारत हज का रुक्न नहीं, और वहाँ न किसी चीज़ को छूना चाहिए न बरकत का ज़रिया समझना चाहिए:
- जबले-नूर और ग़ारे-हिरा, जहाँ क़ुरआन की पहली आयतें उतरीं।
- जबले-सौर, जहाँ हिजरत के वक़्त नबी ﷺ और अबू बक्र ने पनाह ली।
- अरफ़ात, मुज़दलिफ़ा और मिना हज के दिनों के अलावा, ताकि ज़रूरत से पहले उन जगहों को देख लिया जाए।
- मस्जिदे-जिइर्राना और तनईम की मस्जिदे-आइशा, जहाँ मक्का में ठहरे लोग उमरे का एहराम बाँधने जाते हैं।


अध्याय 5
फ़र्ज़, वाजिब और हज अदा करने के तीन तरीक़े
हनफ़ी मसलक में हज और उमरा में फ़र्ज़ (लाज़िमी रुक्न), वाजिब और सुन्नत क्या हैं, एहराम रुक्न नहीं बल्कि शर्त क्यों है, उमरा कैसे अलग है, और हज व उमरा को जोड़ने के तीन तरीक़े, क़िरान, तमत्तु और इफ़राद, हर एक की नीयत के साथ।

हज के अमल के तीन दर्जे
हनफ़ी मसलक में हज के अमल तीन दर्जों में बँटे हैं, और कोई छूट जाए तो क्या होगा, यह उसके दर्जे पर निर्भर है।
| दर्जा | अगर छूट जाए |
|---|---|
| फ़र्ज़ (रुक्न या शर्त) | हज सही या मुकम्मल नहीं होता। कोई दम इसकी जगह नहीं ले सकता। |
| वाजिब | हज सही रहता है, मगर दम (या छोटा बदला) लाज़िम होता है, और जान-बूझकर छोड़ना गुनाह है। |
| सुन्नत | कोई जुर्माना नहीं, मगर सवाब चला जाता है। |
हज के फ़र्ज़ अमल
- एहराम: हज की नीयत तलबिया के साथ। हनफ़ी मसलक में एहराम हज की शर्त (शर्त) है, उसके रुक्नों में से नहीं।
- अरफ़ात का वुक़ूफ़: 9 ज़िलहिज्जा के ज़वाल (दोपहर ढलने) से 10 की सुबह-सादिक़ तक किसी भी वक़्त अरफ़ात के मैदान में मौजूद होना। यह रुक्न (रुक्न) है और इसकी क़ज़ा नहीं हो सकती।
- तवाफ़े-ज़ियारत (जिसे तवाफ़े-इफ़ाज़ा भी कहते हैं), रुक्न। चार चक्कर रुक्न हैं; पूरे सात चक्कर वाजिब हैं। यह वुक़ूफ़ के बाद किया जाता है, और इसका वाजिब वक़्त क़ुर्बानी के दिन (10 से 12 तारीख़) हैं।
हज के वाजिब अमल
- हरम से बाहर से आने वालों के लिए मीक़ात से (या उससे पहले) एहराम।
- अगर वुक़ूफ़ दिन में शुरू हुआ हो तो सूरज डूबने तक अरफ़ात में ठहरना।
- 10 की सुबह-सादिक़ के बाद मुज़दलिफ़ा का वुक़ूफ़, सुबह-सादिक़ और सूरज निकलने से ज़रा पहले के बीच कुछ देर वहाँ रहना।
- सफ़ा और मरवा के बीच सई, सात चक्कर, सफ़ा से शुरू और मरवा पर ख़त्म, सही तवाफ़ के बाद। (हनफ़ी मसलक में सई वाजिब है, रुक्न नहीं।)
- जमरात की रमी (रमी)।
- बाल मुंडवाना या कटवाना (हलक़ या क़स्र), हरम के अंदर और क़ुर्बानी के दिनों के अंदर।
- क़िरान या तमत्तु करने वालों के लिए क़ुर्बानी (दमे-शुक्र)।
- 10 तारीख़ को तरतीब की पाबंदी: रमी, फिर क़ुर्बानी, फिर बाल।
- मीक़ात की हद से बाहर से आने वाले हाजियों के लिए तवाफ़े-विदा (रुख़सती का तवाफ़)।
- तवाफ़े-ज़ियारत क़ुर्बानी के दिनों के अंदर अदा करना, और उसके पूरे सात चक्कर।
- एहराम की पाबंदियों से बचना।
- हर तवाफ़ के अंदर: हजरे-असवद से शुरू करना, काबा बाईं तरफ़ रखना, पाक होना, सतर ढके होना, ताक़त हो तो पैदल चलना, हिज्र के बाहर रहना, और बाद में दो रकअत पढ़ना।
हनफ़ी मसलक में उमरा
उमरा सुन्नते-मुअक्कदा है, उम्र में एक बार, हज की तरह फ़र्ज़ नहीं। यह साल के किसी भी वक़्त किया जा सकता है; सिर्फ़ अरफ़ा, क़ुर्बानी और अय्यामे-तशरीक़ (9 से 13 तारीख़) के दिनों में, जब आप हज के एहराम में पहले से न हों, यह मकरूहे-तहरीमी है।
| हज | उमरा | |
|---|---|---|
| शर्त | एहराम | एहराम |
| रुक्न | अरफ़ात का वुक़ूफ़ · तवाफ़े-ज़ियारत (चार चक्कर) | तवाफ़ (चार चक्कर) |
| वाजिब | ऊपर की फ़ेहरिस्त | सई · बाल मुंडवाना या कटवाना |
| वक़्त | सिर्फ़ हज के महीनों में, वुक़ूफ़ 9 ज़िलहिज्जा को | ऊपर बताए हज के मनासिक के दिनों के सिवा कभी भी |
हज के महीने
हज के महीने शव्वाल, ज़िलक़ादा और ज़िलहिज्जा के पहले दस दिन हैं। हज के मनासिक सिर्फ़ इसी वक़्त में सही हैं। शव्वाल से पहले हज का एहराम बाँधना सही है मगर मकरूह है।
हज करने के तीन तरीक़े
1. क़िरान, हज और उमरा एक साथ
हनफ़ी मसलक तीनों तरीक़ों में क़िरान को सबसे बेहतर मानता है। मीक़ात पर हाजी उमरा और हज दोनों की एक साथ नीयत करता है, उमरे का तवाफ़ और सई करता है, और हज पूरा होने तक एहराम में रहता है, बाल काटे बिना। फिर वह दूसरा तवाफ़ करता है, तवाफ़े-क़ुदूम (सुन्नत); अगर उसके बाद हज की सई करनी हो तो वह उस तवाफ़ को सातों चक्करों में इज़तिबा के साथ और पहले तीन में रमल के साथ करता है। क़िरान वाले हाजी के लिए हज की सई तवाफ़े-क़ुदूम के बाद करना बेहतर है, हालाँकि वह तवाफ़े-ज़ियारत के बाद भी की जा सकती है; वुक़ूफ़ और बाक़ी मनासिक उसके बाद आते हैं।
क़िरान में दमे-शुक्र (शुकराने की क़ुर्बानी) वाजिब है। हाजी उसमें से खा सकता है।
اللَّهُمَّ إِنِّي أُرِيدُ الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ فَيَسِّرْهُمَا لِي وَتَقَبَّلْهُمَا مِنِّي
उच्चारण Allāhumma innī urīdul-ḥajja wal-ʿumrata fa-yassirhumā lī wa taqabbalhumā minnī.
अर्थ ऐ अल्लाह, मैं हज और उमरा का इरादा करता हूँ; दोनों को मेरे लिए आसान कर दे और दोनों को मुझसे क़बूल फ़रमा।
2. तमत्तु, पहले उमरा, फिर हज
हज के महीनों में उमरा करें, बाल कटवाएँ या कतरवाएँ और एहराम से निकल जाएँ, फिर उसी साल हज के लिए नया एहराम बाँधें, आम तौर पर 8 ज़िलहिज्जा को मक्का में अपने ठिकाने से। बाल के बाद एहराम की सारी पाबंदियाँ ख़त्म हो जाती हैं और आप एहराम के बिना मक्का में रहते हैं; आप हज का एहराम 8 से पहले किसी भी वक़्त बाँध सकते हैं, और बेहतर यह है कि नीयत मस्जिदे-हराम में की जाए: सर ढककर दो रकअत पढ़ें, फिर नंगे सर बैठें, नीयत करें और तलबिया पढ़ें। तमत्तु सिर्फ़ उस हाजी के लिए है जो हरम का बाशिंदा नहीं; मक्का का रहने वाला तमत्तु या क़िरान नहीं कर सकता। अगर हाजी अपने साथ क़ुर्बानी का जानवर लाया है तो वह उमरे के बाद एहराम से नहीं निकलता।
दमे-शुक्र वाजिब है। जो इसे अदा न कर सके वह हज के दिनों में तीन रोज़े रखे, हज के एहराम के वक़्त से 9 तारीख़ तक (7, 8 और 9 सबसे बेहतर हैं), और हज पूरा करने के बाद सात रोज़े (अय्यामे-तशरीक़ के बाद, या घर लौटकर)।
اللَّهُمَّ إِنِّي أُرِيدُ الْعُمْرَةَ فَيَسِّرْهَا لِي وَتَقَبَّلْهَا مِنِّي
उच्चारण Allāhumma innī urīdul-ʿumrata fa-yassirhā lī wa taqabbalhā minnī.
अर्थ ऐ अल्लाह, मैं उमरे का इरादा करता हूँ; इसे मेरे लिए आसान कर दे और मुझसे क़बूल फ़रमा।
اللَّهُمَّ إِنِّي أُرِيدُ الْحَجَّ فَيَسِّرْهُ لِي وَتَقَبَّلْهُ مِنِّي
उच्चारण Allāhumma innī urīdul-ḥajja fa-yassirhu lī wa taqabbalhu minnī.
अर्थ ऐ अल्लाह, मैं हज का इरादा करता हूँ; इसे मेरे लिए आसान कर दे और मुझसे क़बूल फ़रमा।
3. इफ़राद, सिर्फ़ हज
मीक़ात पर सिर्फ़ हज की नीयत करें और हज अदा करें। कोई दम लाज़िम नहीं, हालाँकि हाजी नफ़्ली क़ुर्बानी कर सकता है। उमरा बाद में किया जा सकता है। इफ़राद वाला हाजी मीक़ात से 10 तारीख़ के मनासिक तक एहराम में रहता है, और पहुँचने पर तवाफ़े-क़ुदूम (सुन्नत) करता है, और चाहे तो उसके बाद हज की सई।
ख़ुलासा
| क़िरान | तमत्तु | इफ़राद | |
|---|---|---|---|
| मीक़ात पर नीयत | हज और उमरा | उमरा | हज |
| हज से पहले एहराम से बाहर? | नहीं | हाँ, उमरे के बाद | नहीं |
| दमे-शुक्र | वाजिब | वाजिब | नहीं |
| तवाफ़े-क़ुदूम | सुन्नत, उमरे के बाद | , | सुन्नत |
| हज की सई | तवाफ़े-क़ुदूम के बाद (बेहतर) या तवाफ़े-ज़ियारत के बाद | तवाफ़े-ज़ियारत के बाद (बेहतर) | तवाफ़े-ज़ियारत के बाद सबसे बेहतर, या तवाफ़े-क़ुदूम के बाद |
| सबसे बेहतर | सबसे अफ़ज़ल | दूसरा | तीसरा |
अरफ़ात के बाद मनासिक की तरतीब
वुक़ूफ़ के बाद तरतीब सुन्नत से तय है:
- 10 की रात: मुज़दलिफ़ा।
- 10 तारीख़: जमरए-अक़बा की रमी → क़ुर्बानी (क़ारिन और मुतमत्तिअ के लिए) → बाल मुंडवाना या कटवाना → मक्का में तवाफ़े-ज़ियारत।
- 11 और 12 तारीख़: हर दिन ज़वाल के बाद तीनों जमरात की रमी।
- मक्का छोड़ने से पहले: तवाफ़े-विदा।
रमी, क़ुर्बानी और बाल को इस तरतीब से हटकर करने से बचना वाजिब है, और जान-बूझकर ऐसा किया जाए तो मसलक की मो'तमद राय में दम लाज़िम होता है। देखें अध्याय 10 और अध्याय 13।
हज की सुन्नतें
सुन्नतों में से: एहराम से पहले ग़ुस्ल, एहराम की दो सफ़ेद चादरें, एहराम से पहले दो रकअत, मर्दों के लिए एहराम से 10 तारीख़ की पहली कंकरी तक बुलंद आवाज़ से तलबिया, तवाफ़े-क़ुदूम, 9 की रात मिना में गुज़ारना, 9 तारीख़ को सूरज निकलने के बाद अरफ़ात जाना, और मुज़दलिफ़ा में कंकरियाँ जमा करना।
अध्याय 6
मीक़ात और एहराम: पाक हालत में दाख़िल होना
एहराम कहाँ और कब बाँधना है, जिस्म और कपड़ों की तैयारी कैसे करें, मर्द और औरतें क्या पहनती हैं, नीयत और तलबिया कैसे कहें, और हनफ़ी मसलक में तलबिया ख़ुद एहराम का हिस्सा क्यों है।

एहराम क्या है
एहराम वह पाक हालत है जिसमें हाजी हज या उमरे की नीयत करके और तलबिया कहकर (या अल्लाह की बड़ाई ज़ाहिर करने वाला कोई और अमल करके, जैसे क़ुर्बानी का जानवर हाँकना) दाख़िल होता है। हनफ़ी मसलक में एहराम हज और उमरे की शर्त (शर्त) है। सफ़ेद चादरें एहराम नहीं हैं; वे एहराम में मर्द का लिबास हैं। इसी घड़ी से एहराम की पाबंदियाँ लागू हो जाती हैं, जब तक वे मनासिक अदा न हो जाएँ जो हाजी को एहराम से निकालते हैं।
मीक़ात
मीक़ात वह जगह है जिसे हरम से बाहर का हाजी एहराम के बिना पार नहीं कर सकता। एहराम के बिना उसे पार करना ऐसी ख़िलाफ़वर्ज़ी है जिसमें दम लाज़िम होता है, सिवाय इसके कि हाजी मीक़ात पर लौट जाए और वहाँ एहराम बाँध ले।
| मीक़ात | किनके लिए जो आ रहे हों |
|---|---|
| ज़ुल-हुलैफ़ा (बिरे-अली) | मदीना से |
| जुहफ़ा (आज रबीग़ इस्तेमाल होता है) | शाम, मिस्र, उत्तरी अफ़्रीक़ा से |
| क़र्नुल-मनाज़िल (अस-सैलुल-कबीर) | नज्द से, और एशिया तथा भारतीय उपमहाद्वीप से उड़कर आने वाले हाजी |
| यलमलम | यमन से |
| ज़ाते-इरक़ | इराक़ से |

दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और दूसरी जगहों के हाजियों के लिए इसका मतलब
- सीधे जद्दा की उड़ान: बाहर से आने वालों के लिए जद्दा मीक़ात नहीं है। आपका जहाज़ आपके रास्ते के मीक़ात के ऊपर से या उसके पास से गुज़रता है; जहाज़ के वहाँ पहुँचने से पहले एहराम पहन लें और नीयत कर लें, क्रू के एलान के मुताबिक़। पहले से तैयारी करें, ग़ुस्ल करें, एहराम की चादरें एयरपोर्ट पर या घर पर पहन लें, और नीयत हवा में करें।
- पहले मदीना, फिर मक्का: मीक़ात ज़ुल-हुलैफ़ा (बिरे-अली) है, जो मदीना से लगभग 10 किमी है। ग़ुस्ल करें, नमाज़ पढ़ें, और वहाँ मस्जिद में नीयत करें।

अगर आप पहले से मक्का में हैं
- मक्का का बाशिंदा या मक्का में ठहरा कोई भी हज के लिए एहराम अपनी रिहाइश की जगह से बाँधता है।
- उमरे के लिए उन्हें हरम से बाहर हिल्ल (हरम के बाहर की ज़मीन) में जाना होगा, जिसमें सबसे क़रीब तनईम (मस्जिदे-आइशा, लगभग 5 किमी) है, फिर जिइर्राना और हुदैबिया।

एहराम से पहले की सुन्नतें
- नाख़ून काटें, मूँछें सँवारें, बग़ल और ज़ेरे-नाफ़ के बाल साफ़ करें।
- एहराम के लिए ग़ुस्ल करें (ग़ुस्ल), या कम से कम वुज़ू करें। माहवारी या निफ़ास वाली औरत भी ग़ुस्ल करे, हालाँकि ग़ुस्ल से उसकी नापाकी की हालत दूर नहीं होती।
- जिस्म पर ख़ुशबू लगाएँ: एहराम के कपड़े पर नहीं। अगर नीयत के बाद उसकी महक बाक़ी रहे तो कोई हर्ज नहीं।
- मर्द दो साफ़ सफ़ेद बिना सिली चादरें पहनें: कमर के गिर्द एक इज़ार और कंधों पर रिदा। नई या धुली हुई जोड़ी बेहतर है।
- अगर मकरूह वक़्त न हो तो सर ढककर दो रकअत नफ़्ल पढ़ें (एहराम की नमाज़); पहली में सूरह अल-काफ़िरून और दूसरी में सूरह अल-इख़लास पढ़ें।
- नमाज़ के फ़ौरन बाद, क़िबले की तरफ़ मुँह करके नीयत करें।
एहराम में लिबास
मर्द
- दो बिना सिली चादरें: एक कमर के गिर्द, एक कंधों पर। सफ़ेद सबसे अच्छी है।
- कोई सिला या फ़िट कपड़ा नहीं जो जिस्म या किसी अंग को घेरे: कोई क़मीज़, पतलून, अंडरवियर, मोज़े या जूते नहीं।
- सर और चेहरा खुला रहता है। हनफ़ी मसलक मर्द को सर के साथ चेहरा ढकने से भी रोकता है।
- खुली चप्पलें जो पाँव का ऊपरी हिस्सा (पाँव की बीच की हड्डी) खुला रखें। जो जूता पाँव के ऊपरी हिस्से को ढके वह नहीं पहना जा सकता।
- बेल्ट, पैसों की थैली, घड़ी, अँगूठी और चश्मा जायज़ हैं।
औरतें
- आम सादा लिबास जो चेहरे और हाथों के सिवा पूरा जिस्म ढके; सिले कपड़े, मोज़े और जूते जायज़ हैं।
- चेहरा किसी ऐसी चीज़ से नहीं ढका जाता जो उसे छुए। अगर ग़ैर-मर्द क़रीब हों तो वह कपड़ा नीचे कर सकती है या दुपट्टे को चेहरे के सामने लटका सकती है ताकि वह उसे न छुए।
- ख़ुशबू औरत के लिए भी मर्द की तरह मना है।


नीयत (नीयत) और तलबिया
- दिल में नीयत करें कि आप किस अमल में दाख़िल हो रहे हैं (उमरा, हज, या दोनों)।
- नीयत की दुआ पढ़ें।
- कम से कम एक बार तलबिया कहें: इसके बिना एहराम मुकम्मल नहीं होता। मर्द इसे बुलंद आवाज़ से कहें; औरतें धीमी आवाज़ से।
اللَّهُمَّ إِنِّي أُرِيدُ الْعُمْرَةَ فَيَسِّرْهَا لِي وَتَقَبَّلْهَا مِنِّي
उच्चारण Allāhumma innī urīdul-ʿumrata fa-yassirhā lī wa taqabbalhā minnī.
अर्थ ऐ अल्लाह, मैं उमरे का इरादा करता हूँ; इसे मेरे लिए आसान कर दे और मुझसे क़बूल फ़रमा।
اللَّهُمَّ إِنِّي أُرِيدُ الْحَجَّ فَيَسِّرْهُ لِي وَتَقَبَّلْهُ مِنِّي
उच्चारण Allāhumma innī urīdul-ḥajja fa-yassirhu lī wa taqabbalhu minnī.
अर्थ ऐ अल्लाह, मैं हज का इरादा करता हूँ; इसे मेरे लिए आसान कर दे और मुझसे क़बूल फ़रमा।
لَبَّيْكَ اللّٰهُمَّ لَبَّيْكَ، لَبَّيْكَ لَا شَرِيكَ لَكَ لَبَّيْكَ، إِنَّ الْحَمْدَ وَالنِّعْمَةَ لَكَ وَالْمُلْكَ، لَا شَرِيكَ لَكَ
उच्चारण Labbaik Allāhumma labbaik, labbaika lā sharīka laka labbaik, innal-ḥamda wan-niʿmata laka wal-mulk, lā sharīka lak.
अर्थ हाज़िर हूँ ऐ अल्लाह, हाज़िर हूँ। हाज़िर हूँ, तेरा कोई शरीक नहीं, हाज़िर हूँ। सारी तारीफ़, सारी नेमतें और सारी बादशाही तेरी है। तेरा कोई शरीक नहीं।
चरण-दर-चरण
- नाख़ून काटें और अपने को सँवारें; ग़ुस्ल करें।
- मर्द दो चादरें पहनें; औरतें सादा लिबास पहनें। जिस्म पर ख़ुशबू लगाएँ।
- दो रकअत पढ़ें।
- मीक़ात पर (या उससे पहले), क़िबले की तरफ़ मुँह करके, नीयत करें और दुआ पढ़ें।
- तलबिया कहें और कहते रहें।
- अब से एहराम की पाबंदियों का ख़याल रखें (अध्याय 7)।


अध्याय 7
एहराम की पाबंदियाँ और उनका बदला (जिनायत और दम)
एहराम में क्या मना है, क्या जायज़ रहता है, हनफ़ी मसलक में भूल से हुई ग़लती पर भी बदला क्यों लाज़िम होता है, और दम व सदक़ा की अलग-अलग क़िस्में, कब कौन-सी लाज़िम होती है और कैसे अदा की जाती है।

एहराम की पाबंदियाँ
लिबास और ढकना
- मर्द: सिले या फ़िट कपड़े जो जिस्म या किसी अंग को घेरें, क़मीज़, पतलून, अंडरवियर, मोज़े, जूते, दस्ताने।
- मर्द: सर या चेहरे को किसी ऐसी चीज़ से ढकना जो उसे छुए, टोपी, पगड़ी, तौलिया, चेहरे पर कपड़ा।
- औरतें: चेहरे को किसी ऐसी चीज़ से ढकना जो उसे छुए। (वह चेहरे के सामने कपड़ा लटका सकती है अगर वह उसे न छुए।)
ख़ुशबू और जिस्म की देखभाल
- जिस्म या एहराम के कपड़े पर, या बिना पकाए खाने में ख़ुशबू इस्तेमाल करना। जान-बूझकर सूँघना मकरूह है।
- बाल या दाढ़ी में इलाज या सजावट के मक़सद से तेल लगाना या कंघी करना।
- जिस्म के किसी भी हिस्से से बाल हटाना, काटना, मुंडवाना, नोचना।
- नाख़ून काटना।
मर्द-औरत के ताल्लुक़ात
- जिमाअ, और जो शहवत के साथ उसकी तरफ़ ले जाए, छूना, चूमना, गले लगाना, और बेहूदा बातें।
शिकार और हरम की ज़मीन
- ख़ुश्की के जंगली जानवर का शिकार करना, या शिकार में किसी की मदद करना, या उसकी निशानदेही करना।
- हरम की ख़ुद उगी घास या दरख़्त काटना। यह हरम में हर किसी पर लागू है, एहराम में हो या न हो।
बर्ताव
- गुनाह और झगड़ा: "हज में न कोई बेहूदा बात, न गुनाह और न झगड़ा है" (सूरह अल-बक़रा 2:197)।
जो अब भी जायज़ है
- नहाना और धोना, जिस्म को हल्के से मलना, एहराम की चादरें बदलना और धोना।
- बेल्ट, पैसों की थैली, घड़ी, अँगूठी, चश्मा और कंधे का बैग।
- ख़ेमे, छत, छाते या सवारी का साया।
- खुली चप्पलें जो पाँव का ऊपरी हिस्सा खुला रखें (मर्द)।
- नुक़सान पहुँचाने वाले जानवरों को मारना: साँप, बिच्छू, चूहे, कौवे, चीलें, भेड़िये और पागल कुत्ते; मच्छर या पिस्सू। (जूँ मारना मकरूह है।)
- पछने लगवाना, इंजेक्शन, दवा और बिना ख़ुशबू की आँख की बूँदें; दाँत निकलवाना।
- बिना ख़ुशबू का खाना खाना; बिना ख़ुशबू का साबुन और ग़ुस्ल का सामान इस्तेमाल करना।
ग़लती जान-बूझकर न हो तब भी बदला लाज़िम है
हनफ़ी मसलक में एहराम की ख़िलाफ़वर्ज़ी का बदला लाज़िम होता है चाहे हाजी ने जान-बूझकर, भूलकर, मसला न जानने की वजह से, ग़लती से या मजबूरी में किया हो। लेकिन गुनाह सिर्फ़ उसी पर है जिसने जानते हुए और बिना किसी सही उज़्र के किया। इसलिए जिस हाजी ने भूलकर सर ढक लिया या ग़लती से नाख़ून काट लिए, उस पर भी नीचे बताया गया बदला लाज़िम है, मगर गुनाह के बिना।
बदले की क़िस्में
1. दमे-शुक्र, शुकराने की क़ुर्बानी
क़िरान और तमत्तु (अध्याय 5) में लाज़िम है। हरम में, क़ुर्बानी के दिनों के अंदर, भेड़ या बकरी (या गाय या ऊँट का एक हिस्सा) ज़बह करें। हाजी उसमें से खा सकता है। अगर वह न कर सके तो हज के दिनों में तीन रोज़े और हज पूरा करने के बाद सात रोज़े रखे।
2. दमे-जिनायत, ख़िलाफ़वर्ज़ी पर भेड़
पूरी ख़िलाफ़वर्ज़ी में हरम में एक भेड़ या बकरी (या गाय या ऊँट का एक हिस्सा) ज़बह करना लाज़िम है। उसका गोश्त हरम के ग़रीबों को मिलता है; हाजी उसमें से नहीं खा सकता। पूरी ख़िलाफ़वर्ज़ियों में ये शामिल हैं:
- किसी पूरे अंग पर, या जिस्म के ज़्यादातर हिस्से पर ख़ुशबू इस्तेमाल करना;
- पूरे दिन या पूरी रात सिले कपड़े पहनना, या सर ढकना;
- सर का चौथाई हिस्सा या उससे ज़्यादा, दाढ़ी, या दोनों बग़लों के बाल काटना या हटाना;
- पूरे हाथ या पूरे पाँव के नाख़ून काटना (पाँचों नाख़ून एक साथ);
- ज़ौजियत से जुड़ी ख़िलाफ़वर्ज़ी, जैसा नीचे बयान हुआ।
3. सदक़ा, छोटा सदक़ा
आंशिक ख़िलाफ़वर्ज़ी में छोटा सदक़ा लाज़िम है: हर ख़िलाफ़वर्ज़ी पर एक ग़रीब को आधा साअ गेहूँ (लगभग 1.6–2 किलो, या उसकी क़ीमत)। यह मसलन तब लाज़िम होता है जब किसी अंग से कम पर ख़ुशबू लगे, एक दिन से कम सिले कपड़े पहने जाएँ या सर ढका जाए, सर के चौथाई से कम बाल काटे जाएँ, या पाँच से कम नाख़ून काटे जाएँ। अगर कुल रक़म एक भेड़ जितनी हो जाए तो भेड़ ही काफ़ी है।
4. फ़िदया, उज़्र वाले के लिए इख़्तियार
भाग 2 जैसी उज़्र वाली ख़िलाफ़वर्ज़ी (बीमारी, चोट, गर्मी, सर्दी) में इनमें से एक चुनें: एक भेड़ ज़बह करें, या छह ग़रीबों को खाना खिलाएँ (हर एक को आधा साअ गेहूँ), या तीन रोज़े रखें (सूरह अल-बक़रा 2:196)। जिस हाजी का कोई उज़्र नहीं उसके पास यह इख़्तियार नहीं: उसे ज़बह ही करना होगा।
5. ज़ौजियत से जुड़ी ख़िलाफ़वर्ज़ियाँ
| कब हुआ | हुक्म |
|---|---|
| अरफ़ात के वुक़ूफ़ से पहले जिमाअ | हज बातिल हो जाता है। एक भेड़ ज़बह करें, मनासिक पूरे करें, और बाद के साल हज की क़ज़ा करें। |
| वुक़ूफ़ के बाद, बाल मुंडवाने या कटवाने से पहले | हज सही रहता है; एक ऊँट ज़बह करें (गाय भी क़बूल है)। |
| बाल मुंडवाने के बाद, तवाफ़े-ज़ियारत से पहले | हज सही रहता है; एक भेड़ ज़बह करें। |
| उमरा, तवाफ़ के चार चक्करों से पहले | उमरा बातिल हो जाता है; एक भेड़ ज़बह करें और उसकी क़ज़ा करें। |
| उमरा, चार चक्करों के बाद | उमरा सही रहता है; एक भेड़ ज़बह करें। |
| शहवत से चूमना या छूना | एक भेड़, इंज़ाल हुआ हो या नहीं। |
6. शिकार और हरम के दरख़्त
शिकार मारने या हरम का उगता दरख़्त काटने पर उसकी क़ीमत अदा करें: दो आदिल मर्दों से उसका अंदाज़ा लगवाएँ, फिर चुनें कि उस क़ीमत का क़ुर्बानी का जानवर ख़रीदें, या ग़रीबों के लिए खाना ख़रीदें (हर एक को आधा साअ), या हर आधे साअ के बदले एक रोज़ा रखें। हनफ़ी मसलक में बदला क़ीमत के हिसाब से होता है, मिलते-जुलते जानवर के हिसाब से नहीं।
7. हज का कोई वाजिब छूट जाना
| क्या छूटा | बदला |
|---|---|
| सूरज डूबने से पहले अरफ़ात छोड़ देना और लौटकर न आना | एक भेड़ |
| बिना उज़्र मुज़दलिफ़ा का वुक़ूफ़ छोड़ना | एक भेड़ |
| रमी बिल्कुल न करना, या एक पूरे दिन की रमी छोड़ना | एक भेड़ |
| एक कंकरी छूटना, या किसी दिन की रमी का कुछ हिस्सा छूटना | सदक़ा |
| बाल या क़ुर्बानी को क़ुर्बानी के दिनों के बाद तक टालना | एक भेड़ |
| तवाफ़े-विदा न करना | एक भेड़ |
| छोटी नापाकी में तवाफ़े-ज़ियारत | एक भेड़ (अगर मक्का में हों तो उसे दोहराएँ) |
| बड़ी नापाकी (जनाबत या माहवारी) में तवाफ़े-ज़ियारत | एक ऊँट (अगर मक्का में हों और कर सकें तो उसे दोहराएँ) |
| एहराम के बिना मीक़ात पार करना | एक भेड़, सिवाय इसके कि वह मीक़ात पर लौटकर एहराम बाँध ले |
8. इहसार, रोक दिया जाना
जिस हाजी को दुश्मन, बीमारी या किसी और रुकावट ने रोक दिया हो वह क़ुर्बानी का जानवर (या उसकी क़ीमत) हरम में भेजता है और उसके ज़बह होने का दिन तय कर लेता है; ज़बह होने पर वह बाल मुंडवाकर या कटवाकर एहराम से निकल जाता है। जिससे उसे रोका गया था उसकी क़ज़ा करना उस पर है: हज के साथ एक उमरा, या सिर्फ़ उमरा।
व्यावहारिक सुझाव
- नीयत से पहले नाख़ून और बाल सँवारना पूरा कर लें।
- बिना ख़ुशबू का साबुन, शैम्पू और वाइप्स पैक करें।
- अगर ग़लती हो जाए तो उसे छिपाएँ नहीं: उसी दिन अपने दीनी रहनुमा को बताएँ और बदले का इंतज़ाम अपनी आधिकारिक हज संस्था के ज़रिए करें, ग़ैर-आधिकारिक वसूल करने वालों को हरगिज़ नहीं।
- एहराम की एक अतिरिक्त चादर साथ रखें।
अध्याय 8
तवाफ़: काबा का चक्कर लगाना
हनफ़ी मसलक में तवाफ़ की क़िस्में, उसमें क्या फ़र्ज़ और वाजिब है, उसे चक्कर-दर-चक्कर कैसे अदा करें, उसकी सुन्नतें और दुआ, क्या उसे बातिल या नामुकम्मल बनाता है, और व्हीलचेयर पर या ऊपरी मंज़िलों पर तवाफ़।

तवाफ़ क्या है
तवाफ़ काबा के गिर्द सात चक्कर लगाना है, हजरे-असवद से शुरू करके उसी पर ख़त्म करना, काबा बाईं तरफ़ रखते हुए। कुछ तवाफ़ फ़र्ज़ हैं, कुछ वाजिब और कुछ सुन्नत, लेकिन सब एक ही तरह अदा होते हैं।
| तवाफ़ | हुक्म |
|---|---|
| उमरे का तवाफ़ | उमरे में फ़र्ज़ (चार चक्कर) |
| तवाफ़े-ज़ियारत (इफ़ाज़ा) | हज में फ़र्ज़ (चार चक्कर); सातों वाजिब हैं; इसका वक़्त 10 तारीख़ की सुबह-सादिक़ से शुरू होकर 12 तारीख़ को सूरज डूबने पर ख़त्म होता है, और 10 तारीख़ को करना बेहतर है; इसके बाद तक टालने पर दम लाज़िम है (सिवाय उस औरत के जो माहवारी में हो, वह पाक होने तक इंतज़ार करती है) |
| तवाफ़े-क़ुदूम (आमद का) | सुन्नत, उस हाजी के लिए जो मीक़ात से बाहर का है और इफ़राद या क़िरान कर रहा है |
| तवाफ़े-विदा (रुख़सती का) | मीक़ात की हद से बाहर के हाजियों पर वाजिब, मनासिक के बाद |
| नफ़्ल तवाफ़ | किसी भी वक़्त मुस्तहब |
| नज़्र का तवाफ़ | नज़्र मानने वाले पर वाजिब |
तवाफ़ की शर्तें और वाजिबात
- नीयत: तवाफ़ करने की आम नीयत काफ़ी है; हज या उमरे के तवाफ़ के लिए आपको उसका नाम दोबारा लेना ज़रूरी नहीं।
- हजरे-असवद से शुरू करना, और वहीं ख़त्म करना।
- काबा आपकी बाईं तरफ़, आगे की ओर चलते हुए।
- हिज्रे-इस्माईल (हतीम) और शाज़रवान के बाहर से, ये काबा का हिस्सा हैं।
- मस्जिदे-हराम के अंदर (किसी भी मंज़िल पर)।
- सात चक्कर: चार चक्कर फ़र्ज़ हिस्सा हैं; बाक़ी तीन वाजिब हैं।
- बड़ी नापाकी (जनाबत, माहवारी, निफ़ास) और छोटी नापाकी से पाकी (वुज़ू होना)। तवाफ़ में पाकी वाजिब है; अगर छूट जाए तो तवाफ़ गिना जाता है, मगर उसे दोहराया जाता है, या दम लाज़िम होता है (अध्याय 7)।
- सतर ढकना।
- पैदल चलना, जो इसकी ताक़त रखता हो।
- इसके बाद दो रकअत पढ़ना।
भीड़ में वुज़ू
हनफ़ी मसलक में औरत को छूने से वुज़ू नहीं टूटता, चाहे बीच में आड़ न हो और चाहे शहवत के साथ हो (जब तक कुछ निकल न आए)। वुज़ू तोड़ने वाली चीज़ें हैं: आगे या पीछे के रास्ते से कुछ निकलना, बहता हुआ ख़ून या पीप, मुँह भर क़ै, लेटकर या टेक लगाकर सोना, और बेहोशी। अपने वुज़ू का ख़याल रखें, और टूटे तो उसे नए सिरे से करें।
नापाकी से सावधान रहें
थैले में रखी चप्पलों पर, बच्चे के पोतड़े पर, कपड़ों पर, और खुले मताफ़ में परिंदों की बीट पर गंदगी का ध्यान रखें।
तवाफ़ में मर्द का सतर
मर्द का सतर नाफ़ से घुटने तक है (घुटना शामिल है)। इज़तिबा ख़त्म होने के बाद ऊपरी जिस्म अदब की वजह से ढक लें।
शुरुआत की रेखा
मस्जिद के एक सुतून पर हरी रोशनी, हजरे-असवद की सीध में, वह जगह बताती है जहाँ तवाफ़ शुरू और ख़त्म होता है। ऊपरी मंज़िलों की अपनी निशान लगी जगह है।
तवाफ़, चरण-दर-चरण
- वुज़ू, सतर ढका हुआ, कपड़े साफ़। जिस तवाफ़ के बाद सई होगी, उस तवाफ़ की शुरुआत में मर्द दायाँ कंधा खोल लें (इज़तिबा)।
- तवाफ़ की नीयत करें।
- हजरे-असवद की सीध में, उसकी तरफ़ मुँह करके, हरी रोशनी से ज़रा पहले खड़े हों।
- अगर किसी को तकलीफ़ दिए बिना हो सके तो दोनों हथेलियों से हजरे-असवद को छुएँ और चूमें (इस्तिलाम)। वरना उसकी तरफ़ मुँह करके खड़े हों, दोनों हाथ कानों तक उठाएँ मानो आपने छुआ हो, अपनी हथेलियाँ चूम लें और कहें "बिस्मिल्लाहि, अल्लाहु अकबर, व लिल्लाहिल-हम्द; वस्सलातु वस्सलामु अला रसूलिल्लाह।" धक्का न दें।
- इस तरह मुड़ें कि काबा आपकी बाईं तरफ़ हो और चलना शुरू करें।
- पहले तीन चक्करों में, अगर तवाफ़ के बाद सई होनी है तो, मर्द छोटे क़दमों से तेज़ चलें (रमल); अगले चार चक्करों में आम रफ़्तार से चलें। औरतें हमेशा आम रफ़्तार से चलती हैं।
- किसी भी ज़बान में दुआ और ज़िक्र करें। हर चक्कर की कोई मुक़र्रर दुआ नहीं है।
- रुक्ने-यमानी पर, अगर भीड़ किए बिना पहुँच सकें तो दाहिने हाथ (या दोनों हाथों) से उसे छुएँ, उसे चूमे बिना। अगर न पहुँच सकें तो कोई इशारा किए बिना आगे बढ़ जाएँ।
- रुक्ने-यमानी और हजरे-असवद के बीच "रब्बना आतिना…" पढ़ें।
- हजरे-असवद पर एक चक्कर पूरा होता है: अगला चक्कर शुरू करने से पहले फिर इस्तिलाम करें। सातवें चक्कर के बाद एक बार और इस्तिलाम करें।
- अपना दायाँ कंधा दोबारा ढक लें।
- तवाफ़ की दो रकअत पढ़ें (वाजिब), हो सके तो मक़ामे-इब्राहीम के पीछे, लेकिन मस्जिद में कहीं भी सही है। मताफ़ को बंद न करें। इन्हें मकरूह वक़्त में न पढ़ें (फ़ज्र के बाद सूरज निकलने तक, ठीक दोपहर में, और अस्र के बाद सूरज डूबने तक): वक़्त के गुज़रने का इंतज़ार करें।
- हजरे-असवद और दरवाज़े के बीच मुल्तज़म पर दुआ करें।
- ज़मज़म पिएँ, खड़े होकर और काबा की तरफ़ मुँह करके, और दुआ करें।
- अगर सई आगे है तो हजरे-असवद को फिर छुएँ (इस्तिलाम) और सफ़ा की तरफ़ जाएँ।

بِسْمِ اللّٰهِ، اللّٰهُ أَكْبَرُ، وَلِلّٰهِ الْحَمْدُ، وَالصَّلَاةُ وَالسَّلَامُ عَلَى رَسُولِ اللّٰهِ
उच्चारण Bismillāhi, Allāhu akbar, wa lillāhil-ḥamd, waṣ-ṣalātu was-salāmu ʿalā Rasūlillāh.
अर्थ अल्लाह के नाम से; अल्लाह सबसे बड़ा है, और अल्लाह ही के लिए सारी तारीफ़ है; और अल्लाह के रसूल पर दरूद और सलाम हो।
رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ
उच्चारण Rabbanā ātinā fid-dunyā ḥasanah, wa fil-ākhirati ḥasanah, wa qinā ʿadhāban-nār.
अर्थ ऐ हमारे रब, हमें दुनिया में भलाई दे और आख़िरत में भलाई दे, और हमें आग के अज़ाब से बचा।
सूरह अल-बक़रा 2:201
وَاتَّخِذُوا مِن مَّقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى
उच्चारण Wattakhidhū min maqāmi Ibrāhīma muṣallā.
अर्थ और इब्राहीम के खड़े होने की जगह को नमाज़ की जगह बना लो।
सूरह अल-बक़रा 2:125

तवाफ़ की सुन्नतें
- हर चक्कर की शुरुआत में हजरे-असवद का इस्तिलाम और उसे चूमना।
- रुक्ने-यमानी को छूना।
- जिस तवाफ़ के बाद सई हो उसके पहले तीन चक्करों में इज़तिबा और रमल।
- पूरे दौरान ज़िक्र और दुआ।
- सातों चक्कर लगातार अदा करना।
- आजिज़ी और यकसूई।

जब तवाफ़ नामुकम्मल हो या दोहराना पड़े
- हिज्र के अंदर से या शाज़रवान के ऊपर से गुज़रना: वह चक्कर गिना नहीं जाता; उसे दोहराएँ।
- चार से कम चक्कर हुए: तवाफ़ सही नहीं; उसे पूरा करें।
- तवाफ़ के दौरान वुज़ू टूट जाना: बाहर जाएँ, वुज़ू नए सिरे से करें और जहाँ रुके थे वहीं से जारी रखें (उस चक्कर को हजरे-असवद से दोबारा शुरू करना बेहतर है)।
- बड़ी या छोटी नापाकी में तवाफ़: तवाफ़ गिना जाता है, मगर जब तक आप मक्का में हैं उसे दोहराना वाजिब है, वरना दम लाज़िम है (अध्याय 7)।
- अगर इक़ामत कही जाए तो नमाज़ में शामिल हों, फिर जहाँ रुके थे वहीं से जारी रखें।
जो मकरूह है मगर तवाफ़ नहीं तोड़ता
- खाना-पीना, और दुनियावी बातें करना।
- ऊँची आवाज़ से दुआ जो दूसरों को परेशान करे, और फ़ोन कॉल।
- आख़िरी चार चक्करों में, या औरतों का रमल करना।
- पेशाब-पाख़ाने की हाजत रोके रखना।
- बिना ज़रूरत चक्करों के बीच रुकना।
व्हीलचेयर और ऊपरी मंज़िलें
- पहली मंज़िल और छत पर तवाफ़ सही है; चक्कर लंबे होते हैं, इसलिए ज़्यादा वक़्त रखें।
- व्हीलचेयर के लिए एक अलग रास्ता है। व्हीलचेयर धकेलने वाला शख़्स दोनों के लिए गिना जाता है अगर दोनों तवाफ़ की नीयत करें।

सुझाव
- अपनी चप्पलें किसी छोटे थैले में रखें या अपने दरवाज़े के पास के रैकों पर छोड़ें; रैक का नंबर नोट कर लें।
- शुरू करने से पहले अपने साथियों के साथ मिलने की जगह तय कर लें।
- मग़रिब और इशा के बाद की सबसे ज़्यादा भीड़ वाले वक़्तों से बचें।
- अपना बैग आगे की तरफ़ रखें।
- चक्करों को उँगलियों पर या काउंटर से गिनें।
- काबा या हजरे-असवद तक पहुँचने के लिए कभी धक्का न दें।
अध्याय 9
सई: सफ़ा और मरवा के बीच चलना
सफ़ा और मरवा की पहाड़ियों के बीच हाजरा के नक़्शे-क़दम पर सात बार चलना: हनफ़ी मसलक में यह वाजिब है, इसकी शर्तें, चक्करों को कैसे गिनें, सुन्नतें और दुआ, हरी रोशनियाँ, और ऊपरी व निचली मंज़िलों पर ध्यान देने की बातें।

सई क्या है
सई सफ़ा और मरवा की पहाड़ियों के बीच सात बार आना-जाना है। हनफ़ी मसलक में यह हज और उमरा दोनों का वाजिब है, रुक्न नहीं। यह हाजरा की उस तलाश की याद दिलाती है जब वे अपने बेटे इस्माईल के लिए पानी ढूँढती इन दोनों पहाड़ियों के बीच दौड़ीं, यहाँ तक कि अल्लाह ने ज़मज़म का चश्मा जारी कर दिया (अध्याय 4)।
إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِن شَعَائِرِ اللَّهِ ۖ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَن يَطَّوَّفَ بِهِمَا
उच्चारण Innaṣ-ṣafā wal-marwata min shaʿā'irillāh, faman ḥajjal-baita awiʿtamara falā junāḥa ʿalaihi an yaṭṭawwafa bihimā.
अर्थ बेशक सफ़ा और मरवा अल्लाह की निशानियों में से हैं। तो जो कोई इस घर का हज या उमरा करे, उस पर कोई गुनाह नहीं कि वह इन दोनों के बीच चक्कर लगाए।
सूरह अल-बक़रा 2:158
आज दोनों पहाड़ियाँ और उनके बीच का रास्ता, मसआ, लगभग 420 मीटर लंबा, मस्जिदे-हराम के अंदर, कई मंज़िलों वाली एक लंबी, एयर-कंडीशंड गैलरी में है।

सही सई की शर्तें
- यह तवाफ़ के बाद होती है: उमरे का तवाफ़, तवाफ़े-क़ुदूम या तवाफ़े-ज़ियारत (कम से कम उसका बड़ा हिस्सा, चार चक्कर)। किसी भी तवाफ़ से पहले की गई सई सही नहीं।
- सफ़ा से शुरू करें और मरवा पर ख़त्म करें। सफ़ा से मरवा एक है; मरवा से सफ़ा दो है; सातवाँ चक्कर मरवा पर ख़त्म होता है। जो चक्कर पहले मरवा से शुरू हो वह गिना नहीं जाता।
- सात चक्कर, यक़ीन के साथ।
- मसआ के अंदर, दोनों पहाड़ियों के बीच का तय रास्ता।
- सई की नीयत; यह कोई आम सैर नहीं है।
सई की सुन्नतें
- वुज़ू में होना।
- सफ़ा की तरफ़ जाने से पहले हजरे-असवद का इस्तिलाम (इस्तिलाम)।
- बाब-ए-सफ़ा से निकलना।
- सफ़ा और मरवा पर थोड़ा ऊपर चढ़ना।
- सफ़ा और मरवा पर काबा की तरफ़ मुँह करके तकबीर और तहलील कहना, और दुआ के लिए हाथ उठाना।
- सातों चक्कर एक के बाद एक करना।
- मर्द हरी रोशनियों के बीच तेज़ चलें (रमल)। औरतें आम रफ़्तार से चलें।
- पूरे दौरान दुआ और ज़िक्र।
- ताक़त हो तो पैदल चलना।
सई, चरण-दर-चरण
- तवाफ़, दो रकअत, मुल्तज़म पर दुआ, ज़मज़म और इस्तिलाम के बाद सफ़ा की तरफ़ जाएँ।
- उसके क़रीब पहुँचते हुए "इन्नस-सफ़ा वल-मरवता मिन शआइरिल्लाह…" पढ़ें और "अब्दउ बिमा बदअल्लाहु बिह" कहें।
- थोड़ा ऊपर चढ़ें, काबा की तरफ़ मुँह करें, हाथ उठाएँ, तीन बार अल्लाहु अकबर और नीचे दिया गया ज़िक्र कहें, और दुआ करें।
- मरवा की तरफ़ चलें। हरी रोशनियों के बीच मर्द तेज़ चलें।
- मरवा पर, पहला चक्कर, काबा की तरफ़ मुँह करें और ज़िक्र व दुआ दोहराएँ।
- सफ़ा की तरफ़ वापस चलें: दूसरा चक्कर।
- तब तक जारी रखें जब तक सातवाँ चक्कर मरवा पर पूरा न हो जाए।
- फिर बाल मुंडवाएँ या कटवाएँ (अध्याय 10)।
اللّٰهُ أَكْبَرُ، اللّٰهُ أَكْبَرُ، اللّٰهُ أَكْبَرُ. لَا إِلٰهَ إِلَّا اللّٰهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ. لَا إِلٰهَ إِلَّا اللّٰهُ وَحْدَهُ، أَنْجَزَ وَعْدَهُ، وَنَصَرَ عَبْدَهُ، وَهَزَمَ الْأَحْزَابَ وَحْدَهُ
उच्चारण Allāhu akbar (×3). Lā ilāha illallāhu waḥdahū lā sharīka lah, lahul-mulku wa lahul-ḥamd, wa huwa ʿalā kulli shai'in qadīr. Lā ilāha illallāhu waḥdah, anjaza waʿdah, wa naṣara ʿabdah, wa hazamal-aḥzāba waḥdah.
अर्थ अल्लाह सबसे बड़ा है (तीन बार)। अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं; उसी की बादशाही है और उसी के लिए तारीफ़ है, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है। अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है; उसने अपना वादा पूरा किया, अपने बंदे की मदद की, और अकेले ही लश्करों को शिकस्त दी।
सहीह मुस्लिम में नबी के हज के बयान से
رَبِّ اغْفِرْ وَارْحَمْ، إِنَّكَ أَنْتَ الْأَعَزُّ الْأَكْرَمُ
उच्चारण Rabbighfir warḥam, innaka antal-aʿazzul-akram.
अर्थ मेरे रब, बख़्श दे और रहम कर। बेशक तू ही सबसे ज़बरदस्त, सबसे करम वाला है।
इब्ने-मसऊद और इब्ने-उमर से रिवायत है

ध्यान देने की बातें
- व्हीलचेयर की लेन: वे हर पहाड़ी के दामन से पहले मुड़ती हैं; वहाँ मुड़ना पहाड़ी तक पहुँचने के बराबर गिना जाता है।
- ज़मज़म के लिए रुकना: अगर सई के दौरान पीने के लिए रुकें तो जारी रखने से पहले जहाँ रुके थे वहाँ से थोड़ा पीछे हट जाएँ।
- निचली मंज़िल: यह पक्का कर लें कि आप सफ़ा और मरवा दोनों पर रास्ते के सिरे तक पहुँचें।
- नफ़्ली सई नहीं होती। सई सिर्फ़ हज या उमरे के साथ, तवाफ़ के बाद अदा होती है।
- मरवा पर ग़ैर-आधिकारिक "नाइयों" से सावधान रहें जो ऊँची फ़ीस लेते हैं।
अगर गिनती भूल जाएँ या रुकावट आए
- अगर आपको शक हो कि आपने पाँच चक्कर पूरे किए या छह, तो कम संख्या लें और जारी रखें।
- अगर इक़ामत कही जाए तो जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ें, फिर जहाँ रुके थे वहीं से जारी रखें।
- अगर थक जाएँ तो आराम करके फिर जारी रख सकते हैं।
- बिना उज़्र सई का एक या ज़्यादा चक्कर छोड़ देने पर दम लाज़िम है; चार से कम चक्कर छूटने की भरपाई सदक़े से हो सकती है (अध्याय 7)।
अध्याय 10
बाल मुंडवाना या कटवाना (हलक़ और क़स्र) और एहराम से निकलना
बाल हटाना हज और उमरे में वाजिब है, और इसी से आप एहराम से निकलते हैं। यह अध्याय बताता है कि कितने बाल, कहाँ, कब, किसके हाथ से, और हज में एहराम से पहला और दूसरा निकलना कैसे हासिल होता है।

यह क्या है
हलक़ सर मुंडवाना है; क़स्र बाल कतरवाना है। हनफ़ी मसलक में यह हज और उमरा दोनों का वाजिब है, रुक्न नहीं, और यही हाजी को एहराम से निकालता है।
- मर्द: पूरा सर मुंडवाना सुन्नत और बेहतर (अफ़ज़ल) है। कतरवाना काफ़ी है, मगर हर बाल कम से कम एक इंच कतरा जाए और वह सर के कम से कम चौथाई हिस्से को घेरे; जिस हाजी के बाल एक इंच से छोटे हों उसे मुंडवाना ही होगा। सिर्फ़ चौथाई मुंडवाना या कतरवाना मकरूह (मकरूहे-तहरीमी) है। यहाँ-वहाँ कुछ बाल कतर लेना आपको एहराम से नहीं निकालता।
- औरतें: कभी न मुंडवाएँ, उनके लिए हराम है। औरत अपने कम से कम चौथाई बालों में, चोटियों के सिरों से एक इंच (लगभग उँगली के एक पोर) से कुछ ज़्यादा कतरे।
- यह हरम के अंदर (मक्का या मिना में) होना चाहिए।
- हज में इसका वक़्त क़ुर्बानी के दिन (ज़िलहिज्जा की 10 से 12 तारीख़) हैं।
अर्थ नबी ﷺ ने तीन बार दुआ की, "ऐ अल्लाह, सर मुंडवाने वालों पर रहम कर," और जब सहाबा ने पूछा, "और कतरवाने वालों पर, ऐ अल्लाह के रसूल?", तो आपने उन्हें चौथी बार में शामिल कर लिया। (बुख़ारी और मुस्लिम में रिवायत है।)
कब
- उमरा: तवाफ़ और सई मुकम्मल होने के बाद।
- हज: 10 तारीख़ को, जमरए-अक़बा की रमी के बाद (और जिन पर क़ुर्बानी है उनके लिए क़ुर्बानी के बाद) और तवाफ़े-ज़ियारत से पहले।
काम की तफ़सील
- क़िबले की तरफ़ मुँह करके बैठें और दाईं तरफ़ से शुरू करें। जब हाजी वे सारे मनासिक पूरे कर चुका हो जिनके लिए मुंडवाना है, तो वह अपना सर ख़ुद भी मुंडवा सकता है और किसी दूसरे मुसलमान का भी।
- औरतें अपने कमरे में या औरतों के बीच, सतर ढककर बाल काटें।
- जो मर्द बिल्कुल गंजा हो वह अपने सर पर उस्तरा फिरा ले।
- अपना साफ़ ब्लेड इस्तेमाल करें और ब्लेड कभी साझा न करें। मरवा पर बिना लाइसेंस के "नाइयों" से बचें जो ऊँची फ़ीस लेते हैं।
एहराम से निकलना
उमरा
एक ही बार निकलना है। जब तवाफ़, सई और बाल हो जाएँ तो सारी पाबंदियाँ ख़त्म हो जाती हैं।
हज: पहला और दूसरा निकलना
- पहला निकलना (तहल्लुले-अव्वल): 10 तारीख़ को जमरए-अक़बा की रमी, क़ुर्बानी (जिन पर लाज़िम है) और बाल के बाद। एहराम की सारी पाबंदियाँ ख़त्म हो जाती हैं, कपड़े, ख़ुशबू, नाख़ून, बाल, सिवाय पति-पत्नी के ताल्लुक़ के।
- दूसरा निकलना (तहल्लुले-सानी): तवाफ़े-ज़ियारत (कम से कम चार चक्कर, और उसके बाद की सई अगर अभी नहीं हुई) के बाद। पति-पत्नी का ताल्लुक़ जायज़ हो जाता है।
10 तारीख़ की तरतीब
- जमरए-अक़बा की रमी।
- क़ुर्बानी (क़ारिन और मुतमत्तिअ के लिए)।
- मुंडवाना या कतरवाना।
- तवाफ़े-ज़ियारत (10 से 12 तारीख़)।
इस तरतीब की पाबंदी वाजिब है। हाजी एहराम की सारी पाबंदियों में तब तक रहता है जब तक वह बताए गए तरीक़े से मुंडवा या कतरवा न ले; अगर इससे पहले वह आम कपड़े पहन ले तो दम लाज़िम हो सकता है। अगर जान-बूझकर बदले तो दम लाज़िम है; अगर भूलकर या न जानने की वजह से हो तो गुनाह नहीं, लेकिन मो'तमद राय के मुताबिक़ फिर भी बदला लाज़िम है, अपने दीनी रहनुमा से पूछें।

अध्याय 11
8 और 9 तारीख़: तरविया और अरफ़ात का वुक़ूफ़
"हज अरफ़ा है।" तमत्तु करने वाला हाजी 8 तारीख़ को हज का एहराम कैसे बाँधता है, मिना और फिर अरफ़ात की रवानगी, वुक़ूफ़ का वक़्त और शर्तें, हनफ़ी मसलक में अरफ़ात की नमाज़, आपकी ज़िंदगी की सबसे अहम दोपहर में क्या करें, और वे अंधविश्वास जिन्हें नज़रअंदाज़ करना है।

ज़िलहिज्जा की 8 तारीख़: यौमे-तरविया
8 तारीख़ तरविया का दिन है, रिवायत है कि इस दिन हाजी आने वाले दिनों के लिए पानी जमा करते थे।
हज का एहराम बाँधना (तमत्तु करने वाले हाजी)
- ज़रूरत हो तो नाख़ून काटें और अपने को सँवारें, और ग़ुस्ल करें।
- अपने जिस्म पर ख़ुशबू लगाएँ (कपड़े पर नहीं)।
- मर्द एहराम की दो चादरें पहनें; औरतें चेहरा खुला रखकर सादा लिबास पहनें।
- अगर मकरूह वक़्त न हो तो दो रकअत नफ़्ल पढ़ें।
- मक्का में अपने ठिकाने पर हज की नीयत करें और तलबिया पढ़ें।
اللَّهُمَّ إِنِّي أُرِيدُ الْحَجَّ فَيَسِّرْهُ لِي وَتَقَبَّلْهُ مِنِّي
उच्चारण Allāhumma innī urīdul-ḥajja fa-yassirhu lī wa taqabbalhu minnī.
अर्थ ऐ अल्लाह, मैं हज का इरादा करता हूँ; इसे मेरे लिए आसान कर दे और मुझसे क़बूल फ़रमा।
क़िरान या इफ़राद करने वाले हाजी उसी एहराम में हैं जो उन्होंने मीक़ात पर बाँधा था।
मक्का से रवानगी

सुन्नत यह है कि 8 तारीख़ को मिना जाएँ, वहाँ ज़ुहर, अस्र, मग़रिब, इशा और फ़ज्र, हर एक अपने वक़्त पर, पढ़ें, रात गुज़ारें, और 9 तारीख़ को सूरज निकलने के बाद अरफ़ात जाएँ। सुन्नत के मुताबिक़ 8 तारीख़ को सूरज निकलने के बाद मक्का से निकलें: सहूलत के लिए इशा के बाद रात को निकलना सुन्नत के ख़िलाफ़ है और बेवजह तकलीफ़ का सबब है। मिना में पाँचों नमाज़ें पढ़ना मुस्तहब है और वहाँ रात गुज़ारना सुन्नत है; सूरज निकलने से पहले मिना से अरफ़ात के लिए न निकलें। क्योंकि लाखों लोगों को एक साथ चलना होता है, बहुत से सरकारी समूह हाजियों को सीधे अरफ़ात ले जाते हैं; 8 तारीख़ की रात मिना में न गुज़ारना एक छूटी हुई सुन्नत है, वाजिब नहीं। अपने समूह के कार्यक्रम का पालन करें और जो वक़्त दिया जाए उस पर तैयार रहें।
वुक़ूफ़ क्या है
वुक़ूफ़ अरफ़ात की ज़मीन में मौजूद होना है, चाहे एक लम्हे के लिए, किसी भी हालत में, खड़े, बैठे, लेटे, जागते या सोते हुए, 9 ज़िलहिज्जा के ज़वाल (सूरज के आसमान के बीच से ढलने) से लेकर 10 की सुबह-सादिक़ तक किसी भी वक़्त। यह हज का रुक्न है और इसकी क़ज़ा नहीं हो सकती। जिसने वुक़ूफ़ दिन में शुरू किया हो उसके लिए सूरज डूबने तक ठहरना वाजिब है।
जिस हाजी का यह छूट जाए उसका उस साल का हज छूट गया: वह उमरे के अमल करके एहराम से निकलता है, उस पर दम लाज़िम है, और उसे किसी और साल हज करना होगा।
सही वुक़ूफ़ की शर्तें
- आप हज के एहराम में हों।
- आप उसके वक़्त में, चाहे एक लम्हे के लिए, अरफ़ात की हदों के अंदर हों।
- आप होश में हों; बेहोशी या नशे की हालत का वुक़ूफ़ सही नहीं, सिवाय इसके कि वह वक़्त के सिर्फ़ एक हिस्से में हो।

यौमे-अरफ़ा, चरण-दर-चरण
- अगर हो सके तो ग़ुस्ल करें (सुन्नत), और सूरज निकलने के बाद अरफ़ात जाएँ।
- अपने ख़ेमे में ठहरें। अपने ख़ेमे का नंबर, ग़ुस्लख़ाने, पानी की जगहें और क्लिनिक जान लें।
- ज़ुहर और अस्र पढ़ें। ज़ुहर का वक़्त शुरू होते ही वुज़ू करें (ग़ुस्ल बेहतर है) और ज़ुहर पढ़ें। हनफ़ी मसलक में ज़ुहर और अस्र ज़ुहर के वक़्त में मिलाकर (जम्अ तक़दीम) सिर्फ़ तब पढ़ी जाती हैं जब सारी छह शर्तें पूरी हों: आप अरफ़ात में या उसके क़रीब हों; ज़िलहिज्जा की 9 तारीख़ हो; हज का इमाम (सुल्तान या उसका नुमाइंदा) मौजूद हो; आप हज के एहराम में हों; पहले ज़ुहर और फिर अस्र पढ़ी जाए; और जमाअत के साथ हो। मुसाफ़िर हर एक दो रकअत पढ़ता है। अगर कोई शर्त न हो, जैसे जब आप अपने ख़ेमे में पढ़ते हैं, तो ज़ुहर अपने वक़्त में और अस्र अपने वक़्त में पढ़ें, जैसे किसी और दिन। अपने तौर पर कभी जमा न करें। अरफ़ात में जुमे की नमाज़ नहीं है: जुमा के दिन भी ज़ुहर पढ़ें।
- ज़वाल से सूरज डूबने तक दुआ में लगे रहें। क़िबले की तरफ़ मुँह करें, हाथ उठाएँ, और अल्लाह से वह सब माँगें जिसकी आपको दुनिया और आख़िरत में ज़रूरत है, अपने लिए, अपने वालिदैन, अपने घरवालों, अपने उस्तादों, मुसलमानों और हर उस शख़्स के लिए जिसने आपसे दुआ की दरख़्वास्त की।
- तलबिया पढ़ें, ज़िक्र, इस्तिग़फ़ार, दरूद और क़ुरआन की तिलावत करें।
- सूरज डूबने से पहले न निकलें। सूरज डूबने के बाद सुकून से मुज़दलिफ़ा के लिए रवाना हों। अरफ़ात में मग़रिब न पढ़ें: वह मुज़दलिफ़ा में इशा के साथ पढ़ी जाती है (अध्याय 12)।
لَا إِلٰهَ إِلَّا اللّٰهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
उच्चारण Lā ilāha illallāhu waḥdahū lā sharīka lah, lahul-mulku wa lahul-ḥamd, wa huwa ʿalā kulli shai'in qadīr.
अर्थ अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं। उसी की बादशाही है और उसी के लिए तारीफ़ है, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है।
"सबसे बेहतरीन दुआ अरफ़ा के दिन की दुआ है, और सबसे बेहतरीन बात जो मैंने और मुझसे पहले के नबियों ने कही वह है…", तिर्मिज़ी में रिवायत है
رَبَّنَا ظَلَمْنَا أَنفُسَنَا وَإِن لَّمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ
उच्चारण Rabbanā ẓalamnā anfusanā wa in lam taghfir lanā wa tarḥamnā lanakūnanna minal-khāsirīn.
अर्थ ऐ हमारे रब, हमने अपनी जानों पर ज़ुल्म किया। अगर तू हमें न बख़्शे और हम पर रहम न करे, तो हम ज़रूर घाटा उठाने वालों में होंगे।
आदम और हव्वा की दुआ, सूरह अल-आराफ़ 7:23

वुक़ूफ़ की सुन्नतें
- वुक़ूफ़ से पहले ग़ुस्ल।
- क़िबले की तरफ़ मुँह करना।
- तलबिया।
- दुआ, दरूद और इस्तिग़फ़ार।
- ज़िक्र और क़ुरआन की तिलावत।
जबले-रहमत
जबले-रहमत: "रहमत का पहाड़", अरफ़ात के पूरब में एक छोटी पथरीली पहाड़ी है। नबी ﷺ उसके दामन में बड़ी चट्टानों के पास खड़े हुए थे। उस पर चढ़ना हज का अमल नहीं है, वुक़ूफ़ के दौरान उस पर चढ़ना बिदअत (बिदअत) है, और यौमे-अरफ़ा पर वहाँ ख़तरनाक हद तक भीड़ और गर्मी होती है। पूरा अरफ़ात वुक़ूफ़ की जगह है: आपका ख़ेमा भी उतना ही अच्छा है जितना पहाड़ी।

अरफ़ात के अंधविश्वास
इन रिवाजों को नज़रअंदाज़ करें, जिनकी दीन में कोई बुनियाद नहीं:
| रिवाज | उसके पीछे की ग़लत मान्यता |
|---|---|
| अरफ़ात में चावल धूप में सुखाना, फिर घर पर उसे ज़मज़म में भिगोकर बाँटना | कि इससे दिल रौशन होता है |
| अरफ़ात में सात पत्थर दबाना | कि वे आपके हक़ में गवाही देंगे और जहन्नम के सात दरवाज़े बंद कर देंगे |
| अरफ़ात में चुपके से रस्सियाँ काटना | कि इससे बच्चे का रोना रुकता है, ग्राहक आते हैं या बड़ी पकड़ मिलती है |
| बच्चे के पहले क़दमों के लिए अरफ़ात की रेत ले जाना | कि बच्चा अरफ़ात पहुँचेगा, मशहूर, सेहतमंद या बहादुर बनेगा |
यौमे-अरफ़ा पर हिफ़ाज़त
- दोपहर के बाद साये में रहें। चलना ही पड़े तो छाता इस्तेमाल करें।
- थोड़ा-थोड़ा करके बार-बार पानी पिएँ, चाहे प्यास न लगे, और कुछ खाएँ।
- अपनी दवाएँ वक़्त पर लें।
- अकेले न निकलें। अगर खो जाएँ तो सबसे क़रीबी सुरक्षा चौकी या अपने देश के मिशन के ख़ेमे पर जाएँ और अपना कार्ड दिखाएँ।
- सूरज डूबने के बाद मुज़दलिफ़ा की रवानगी में घंटों लग सकते हैं। सब्र रखें और अपने समूह के साथ रहें।

अध्याय 12
मुज़दलिफ़ा की रात
यौमे-अरफ़ा पर सूरज डूबने के बाद हाजी मुज़दलिफ़ा जाते हैं। वहाँ मग़रिब और इशा कैसे पढ़ी जाती हैं, मुज़दलिफ़ा का वाजिब वुक़ूफ़ क्या है और कब होता है, कंकरियाँ जमा करना, और किन्हें छूट है।

मुज़दलिफ़ा
मुज़दलिफ़ा अरफ़ात और मिना के बीच, हरम के अंदर है। इसकी हदें साइनबोर्डों से निशान लगी हैं। इसके अंदर मस्जिदे-मशअरुल-हराम है, जो उस जगह बनी है जहाँ नबी ﷺ फ़ज्र के बाद दुआ में खड़े हुए थे। इसके पश्चिमी किनारे की मुहस्सिर की वादी वुक़ूफ़ की जगह नहीं है: उसे जल्दी से पार कर जाएँ।


नमाज़: मग़रिब और इशा एक साथ
मग़रिब अरफ़ात में या रास्ते में न पढ़ें: मुज़दलिफ़ा में मग़रिब और इशा को इशा के वक़्त में एक साथ पढ़ना वाजिब है (जम्अ तअख़ीर), चाहे अकेले हों या जमाअत से। अगर आप इशा के वक़्त से पहले पहुँच जाएँ तो इंतज़ार करें; इशा का वक़्त शुरू होने तक मग़रिब न पढ़ें। जब शुरू हो जाए तो एक बार अज़ान और एक बार इक़ामत कहें, फिर मग़रिब का फ़र्ज़, इशा का फ़र्ज़ (मुसाफ़िर के लिए दो रकअत), फिर मग़रिब की सुन्नत, इशा की सुन्नत और वित्र पढ़ें। अगर ट्रैफ़िक या किसी और वजह से आप सुबह-सादिक़ (सुब्ह सादिक़) से पहले मुज़दलिफ़ा न पहुँच सकें तो दोनों नमाज़ें जहाँ भी हों सुबह-सादिक़ से पहले पढ़ लें।
मुज़दलिफ़ा का वुक़ूफ़ (वाजिब)
हनफ़ी मसलक में यहाँ का वाजिब वुक़ूफ़ है: इसका वक़्त 10 की सुबह-सादिक़ से शुरू होकर सूरज निकलने पर ख़त्म होता है। जो हाजी इस वक़्त का थोड़ा-सा भी हिस्सा मुज़दलिफ़ा में गुज़ार ले उसने इसे अदा कर दिया, हालाँकि सूरज निकलने से ज़रा पहले तक ठहरना बेहतर है। रात भर सुबह-सादिक़ तक वहाँ ठहरना सुन्नते-मुअक्कदा है, और क़ुरआन, दुआ और इबादत में जागना मुस्तहब है। जो हाजी सुबह-सादिक़ से पहले निकल गया, या सूरज निकलने के बाद पहुँचा, उसने इसे अदा नहीं किया और उस पर दम लाज़िम है (अध्याय 7)। हाजियों के लिए ईद की नमाज़ नहीं है।
रात, चरण-दर-चरण
- सूरज डूबने के बाद अरफ़ात से निकलें, सुकून से, ज़बान पर तलबिया के साथ। धक्का न दें।
- पहुँचकर मग़रिब और इशा एक साथ पढ़ें जैसा ऊपर बताया गया।
- अपनी कंकरियाँ जमा करें। 10 तारीख़ के लिए आपको सात चाहिए, और उसके बाद के दिनों के लिए रोज़ाना 21, अगर 12 को रवाना हों तो 49, या 13 तक रुकें तो 70। कुछ ज़्यादा ले लें। बहुत से हाजी यहाँ सिर्फ़ सात जमा करते हैं और बाक़ी मिना में, जो भी जायज़ है।
- अगर हो सके तो आराम करें और सोएँ, कल हज का सबसे लंबा दिन है।
- फ़ज्र का वक़्त शुरू होते ही फ़ज्र पढ़ें: मक्का में फ़ज्र का जो वक़्त है वही मुज़दलिफ़ा में है, इसलिए उसे जल्दी न पढ़ें और सुबह-सादिक़ से पहले न निकलें, इससे वुक़ूफ़ छूट जाता है और दम लाज़िम होता है, फिर क़िबले की तरफ़ मुँह करके दुआ और ज़िक्र में तब तक खड़े रहें जब तक आसमान ख़ूब रौशन न हो जाए, फिर सूरज निकलने से ज़रा पहले मिना के लिए रवाना हों।

कंकरियाँ
- हर कंकरी छोटी होनी चाहिए, चने या खजूर की गुठली जितनी, लगभग उँगली की नोक के बराबर।
- कोई भी पत्थर या मिट्टी जैसी चीज़ (चिकनी मिट्टी, रेतीला पत्थर) सही है। आप उन्हें मुज़दलिफ़ा के अलावा दूसरी जगहों से भी जमा कर सकते हैं, लेकिन जमरात के पास से या नापाक जगहों से नहीं।
- कंकरियों को धोना सुन्नत है, हालाँकि ज़रूरी नहीं।
- उन्हें किसी छोटी थैली या बोतल में रखें, और गिन लें।

रात की सुन्नतें
- तलबिया।
- दुआ।
- ज़िक्र।
- नफ़्ल नमाज़ और वित्र।
- कंकरियाँ जमा करना।
فَإِذَا أَفَضْتُم مِّنْ عَرَفَاتٍ فَاذْكُرُوا اللَّهَ عِندَ الْمَشْعَرِ الْحَرَامِ ۖ وَاذْكُرُوهُ كَمَا هَدَاكُمْ
उच्चारण Fa idhā afaḍtum min ʿarafātin fadhkurullāha ʿindal-mashʿaril-ḥarām, wadhkurūhu kamā hadākum.
अर्थ फिर जब तुम अरफ़ात से लौटो तो मशअरुल-हराम के पास अल्लाह को याद करो, और उसे उस तरह याद करो जैसे उसने तुम्हें हिदायत दी।
सूरह अल-बक़रा 2:198
किन्हें छूट है
औरतें, बुज़ुर्ग, बीमार और माज़ूर लोग भीड़ और अफ़रा-तफ़री की वजह से मुज़दलिफ़ा का वुक़ूफ़ छोड़ सकते हैं, जैसे नबी ﷺ ने अपने घर के कमज़ोर लोगों को इजाज़त दी थी, और उन पर कुछ लाज़िम नहीं। मुज़दलिफ़ा में ग़ुस्लख़ाने कम हैं, इसलिए अरफ़ात से निकलने से पहले हाजत से फ़ारिग़ हो लें। जिसे भी कोई हक़ीक़ी रुकावट रोक ले, भीड़, या कोई बस जो उसकी ग़लती के बिना रुकी रही, उसे भी छूट है। अपने दीनी रहनुमा को बता दें।
मिना की तरफ़ आगे बढ़ना
दूसरे लोग फ़ज्र की जल्दी वाली नमाज़ और कुछ देर की दुआ के बाद निकलते हैं। मिना पहुँचकर पहला काम जमरए-अक़बा की रमी है, अगला अध्याय देखें।

अध्याय 13
मिना और जमरात की रमी
क़ुर्बानी का दिन और अय्यामे-तशरीक़: 10 तारीख़ को जमरए-अक़बा की रमी, क़ुर्बानी, मिना की रातें (हनफ़ी मसलक में सुन्नत), 11 और 12 (और 13) को तीनों जमरात की रमी, सही कंकरी मारने की शर्तें, 12 को रवानगी, दूसरों की तरफ़ से रमी, और भीड़ में हिफ़ाज़त।

मिना
मिना हरम के अंदर एक तंग वादी है, मस्जिदे-हराम से लगभग 7 किमी पूरब, मक्का और मुज़दलिफ़ा के बीच। साल के ज़्यादातर हिस्से में यह ख़ाली रहती है; हज के दौरान यह आग-रोधी, एयर-कंडीशंड ख़ेमों का शहर बन जाती है। इसके पश्चिमी सिरे पर, मक्का की तरफ़, तीनों जमरात हैं, सुतून, जो अब लंबी दीवारें हैं, जो रिवायत के मुताबिक़ उन जगहों को निशान करते हैं जहाँ इब्राहीम ने इब्लीस को भगाया था।
आज जमरात एक बहुमंज़िला इमारत के अंदर हैं जिसमें कई मंज़िलों पर दाख़िले और एकतरफ़ा रास्ते हैं।

| जमरा | दूसरा नाम | दूरी |
|---|---|---|
| सुग़रा: छोटा | अल-ऊला, पहला | मस्जिदे-ख़ैफ़ और कैंपों के सबसे क़रीब |
| वुस्ता: बीच वाला | सुग़रा से लगभग 200 मीटर | |
| कुबरा: बड़ा | अक़बा | वुस्ता से लगभग 247 मीटर, मक्का की तरफ़ |
10 तारीख़: जमरए-अक़बा की रमी
क़ुर्बानी के दिन आप सिर्फ़ जमरए-अक़बा पर सात कंकरियों से रमी करते हैं। यह वाजिब है, और इसे छोड़ने पर दम लाज़िम है। इस दिन बाक़ी दोनों जमरात पर रमी करना बिदअत (बिदअत) है।
| वक़्त | |
|---|---|
| सबसे बेहतर (मसनून) | सूरज निकलने से ज़वाल तक |
| जायज़ | ज़वाल से सूरज डूबने तक (मुबाह)। सूरज डूबने से सुबह-सादिक़ तक, और सुबह-सादिक़ से सूरज निकलने तक, यह मकरूह है, सिवाय औरतों, बीमारों और माज़ूरों के जो भीड़ से डरते हों, उनके लिए बिल्कुल मकरूह नहीं |
अपनी पहली कंकरी के साथ तलबिया बंद करें और तकबीर शुरू करें।
بِسْمِ اللّٰهِ، اللّٰهُ أَكْبَرُ
उच्चारण Bismillāh, Allāhu akbar.
अर्थ अल्लाह के नाम से। अल्लाह सबसे बड़ा है।
10 तारीख़ को अक़बा पर सात कंकरियों के बाद आप दुआ के लिए नहीं रुकते, आगे बढ़ जाएँ।
सही कंकरी मारने की शर्तें
- रमी का वक़्त शुरू हो चुका हो।
- आप पत्थर या मिट्टी जैसी चीज़ मारें, कंकरी, चिकनी मिट्टी या रेतीला पत्थर। सोना, चाँदी, लकड़ी या प्लास्टिक नहीं।
- आप हाथ से मारें, हर कंकरी को दाहिने हाथ के अँगूठे और शहादत की उँगली के बीच पकड़कर, सचमुच मारना, रखना या गिराना नहीं।
- एक बार में एक कंकरी। सात एक साथ मारने पर एक गिनी जाती है।
- कंकरी जमरे पर गिरे, सुतून के गिर्द के हौज़ में, या उससे लगभग डेढ़ मीटर के अंदर। ज़रूरी नहीं कि सुतून से टकराए।
- सात कंकरियाँ, यक़ीन के साथ। शक हो तो एक और मारें।
अय्यामे-तशरीक़ में तरतीब सुग़रा, फिर वुस्ता, फिर कुबरा है।

10 तारीख़ का बाक़ी हिस्सा
अक़बा की रमी के बाद, सुन्नत तरतीब से:
- क़ुर्बानी। क़िरान या तमत्तु करने वाला हाजी हरम में दमे-शुक्र (वाजिब) ज़बह करता है, इस नीयत से कि यह क़िरान या तमत्तु की है, रमी के बाद से 12 तारीख़ को सूरज डूबने तक किसी भी वक़्त। उसके ज़बह होने से पहले वह मुंडवा नहीं सकता: क्रम याद रखें, रमी, क़ुर्बानी, बाल मुंडवाना। अगर यह किसी एजेंट के ज़रिए करवाई जाए तो वक़्त तय कर लें और पक्का कर लें कि हो गई; अगर ज़बह होने से पहले मुंडवा लिया तो दम लाज़िम है। इफ़राद वाले हाजी के लिए क़ुर्बानी सिर्फ़ मुस्तहब है, इसलिए वह रमी के बाद मुंडवा सकता है। यह ईद की क़ुर्बानी नहीं है, जो उस मुक़ीम पर वाजिब है जो निसाब का मालिक हो। क़ुर्बानी में से थोड़ा खाएँ और कुछ ग़रीबों को दें।
- सर मुंडवाएँ या बाल कतरवाएँ: एहराम से पहला निकलना। आम कपड़े पहन लें (अध्याय 10)।
- मक्का में तवाफ़े-ज़ियारत, इसका वक़्त 10 की सुबह-सादिक़ से शुरू होकर 12 को सूरज डूबने पर ख़त्म होता है, और 10 तारीख़ को करना बेहतर है, जो दूसरा निकलना लाता है। यह रमी, क़ुर्बानी और बाल से पहले, बाद या बीच में किया जा सकता है, लेकिन सुन्नत बाल के बाद है; अगर बाल से पहले किया जाए तो बाल तक कुछ भी नहीं खुलता। भीड़ वाले मौसम में औरतें और बुज़ुर्ग इसे 11 या 12 को कर सकते हैं, ज़ुहर से पहले मिना लौटकर। माहवारी वाली औरत पाक होने तक इंतज़ार करती है।
मिना की रातें
हनफ़ी मसलक में 11 और 12 की रातें मिना में गुज़ारना सुन्नत है, वाजिब नहीं; जो हाजी उन्हें मक्का में गुज़ारे उस पर दम नहीं, हालाँकि यह मकरूह है। मिना में ठहरना बेहतर है, जैसा नबी ﷺ ने किया।


अय्यामे-तशरीक़: तीनों जमरात की रमी
11 और 12 (और 13, अगर रुकें) में से हर दिन:
- पहले जमरा सुग़रा पर जाएँ। सात कंकरियाँ, एक-एक करके, बिस्मिल्लाह, अल्लाहु अकबर के साथ मारें।
- एक तरफ़ हट जाएँ, क़िबले की तरफ़ मुँह करें और हाथ उठाकर लंबी दुआ करें।
- जमरा वुस्ता पर जाएँ। सात मारें।
- एक तरफ़ हटकर, क़िबले की तरफ़ मुँह करके फिर दुआ करें।
- जमरा कुबरा (अक़बा) पर जाएँ। सात मारें। दुआ के लिए न रुकें, रवाना हो जाएँ।
वक़्त
| वक़्त | |
|---|---|
| 11 और 12 को | सिर्फ़ ज़वाल के बाद: ज़वाल से सूरज डूबने तक सुन्नत वक़्त है; सूरज डूबने से सुबह-सादिक़ तक मकरूह है; ज़वाल से पहले सही नहीं और क़बूल नहीं |
| 13 को | सुबह-सादिक़ से ज़वाल तक मकरूह है; ज़वाल से सूरज डूबने तक सुन्नत वक़्त है |

12 को मिना से रवानगी
हाजी 12 तारीख़ को तीनों जमरात की रमी के बाद मिना से निकल सकता है। सूरज डूबने से पहले निकलना बेहतर है, लेकिन सूरज डूबने से पहले निकलना वाजिब नहीं है: अगर वह मिना में ही हो और सूरज डूब जाए तो वह रुक भी सकता है और निकल भी सकता है, हालाँकि 13 को रमी किए बिना निकलना मकरूह है, और उस सूरत में 13 को रमी करना वाजिब नहीं। सिर्फ़ तब, जब 13 की सुबह-सादिक़ उसके मिना में रहते हुए हो जाए, 13 को रमी करना वाजिब हो जाता है, और छोड़ने पर दम लाज़िम है। बहुत से हाजी ग़लती से समझते हैं कि सूरज डूबने से पहले निकलना ज़रूरी है; ऐसा करने की कोशिश में वे ज़वाल से पहले रमी कर लेते हैं (जो सही नहीं) या सुबह 10 बजे से धूप में खड़े रहते हैं, और अपने को और दूसरों को ख़तरे में डालते हैं, जो हराम है। सब्र रखें और ज़रूरत हो तो मग़रिब के बाद रमी करें। मक्का वापसी के रास्ते में मग़रिब और इशा पढ़ना न भूलें।
"जो जल्दी करके दो दिन में चला जाए तो उस पर कोई गुनाह नहीं; और जो देर करे तो उस पर भी कोई गुनाह नहीं" (सूरह अल-बक़रा 2:203)।
दूसरों की तरफ़ से रमी
जो हाजी बीमारी, बुढ़ापे, हमल या किसी और हक़ीक़ी माज़ूरी की वजह से रमी न कर सके, वह किसी को अपनी तरफ़ से रमी के लिए मुक़र्रर कर सकता है।
- पहले मेडिकल अफ़सर और अपने समूह के दीनी रहनुमा से पूछ लें।
- आपकी तरफ़ से रमी करने वाले के पास इजाज़त होनी चाहिए, और बेहतर है कि वह हर जमरे पर पहले अपनी रमी करे, फिर आपकी।
- जो सेहतमंद शख़्स रमी कर सकता है, पैदल या सवारी या व्हीलचेयर से, और जिसे कोई नुक़सान का डर नहीं, वह इसे किसी नुमाइंदे के हवाले नहीं कर सकता। जल्दबाज़ी उज़्र नहीं है; बिना सही उज़्र के किसी की तरफ़ से रमी करवाना सही नहीं और दम लाज़िम हो जाता है। औरतों और कमज़ोरों को डरने की ज़रूरत नहीं: इशा के बाद जाएँ, रास्ता साफ़ मिलेगा।
- आप फ़ोन या मैसेज से नुमाइंदा मुक़र्रर कर सकते हैं, बशर्ते दोनों तरफ़ बात साफ़ समझी जाए।
मिना में हिफ़ाज़त
- सब्र रखें, धक्का न दें, और हिदायतों पर चलें। जमरात के पास भीड़ के संगीन हादसे हो चुके हैं।
- अपने तय वक़्त पर जाएँ और तय रास्ता और मंज़िल इस्तेमाल करें।
- जमरात में बड़े बैग या छाते न ले जाएँ। क़ीमती सामान अपने ख़ेमे में छोड़ें।
- भीड़ के बहाव के साथ चलें। अगर कोई गिर जाए तो रुककर उसे उठाएँ, और पीछे वालों को धीमे होने के लिए आवाज़ दें।
- अगर अपने समूह से बिछड़ जाएँ तो सबसे क़रीबी गाइड पोस्ट या सुरक्षा अफ़सर के पास जाएँ और अपना कार्ड दिखाएँ।
- कई कैंपों से जमरात तक और वापसी का पैदल सफ़र रोज़ाना कई किलोमीटर हो सकता है। आराम करें, पानी पिएँ और अपने पाँवों की हिफ़ाज़त करें।


अध्याय 14
उमरा, चरण-दर-चरण
हनफ़ी मसलक में उमरे की पूरी रहनुमाई: इसमें क्या फ़र्ज़ और वाजिब है, एहराम और मीक़ात, तवाफ़, सई और बाल, मक्का में पहले से मौजूद हाजियों के लिए तनईम से उमरा, रोक दिए जाने पर क्या होता है (इस मसलक में नीयत में शर्त लगाने का कोई असर नहीं), और रुख़सत।

उमरा क्या है
उमरा मक्का में काबा की ज़ियारत है, एहराम में, तवाफ़ और सई करने और बाल मुंडवाने या कतरवाने के लिए। हनफ़ी मसलक में उमरा उम्र में एक बार सुन्नते-मुअक्कदा (सुन्नते-मुअक्कदा) है: इसका बड़ा सवाब है और इसे छोड़ना नहीं चाहिए, मगर यह हज की तरह फ़र्ज़ नहीं। यह साल के किसी भी वक़्त किया जा सकता है, सिवाय हज के मनासिक के दिनों (ज़िलहिज्जा की 9 से 13 तारीख़) के, जब यह मकरूह है।
उमरे में क्या फ़र्ज़ और वाजिब है
| शर्त | एहराम, नीयत और तलबिया के साथ |
|---|---|
| रुक्न | तवाफ़, सात में से कम से कम चार चक्कर |
| वाजिब | तवाफ़ के बाक़ी तीन चक्कर · सफ़ा और मरवा के बीच सई · बाल मुंडवाना या कतरवाना · एहराम की पाबंदियों से बचना · मीक़ात पर एहराम बाँधना |
अगर रुक्न छूट जाए तो उमरा सही नहीं। अगर कोई वाजिब छूट जाए तो उमरा सही रहता है और दम (या सदक़ा) लाज़िम होता है (अध्याय 7)।
उमरा कैसे अदा किया जाता है
| चरण | हुक्म | कहाँ |
|---|---|---|
| ग़ुस्ल और एहराम का लिबास | सुन्नत | नीयत से पहले |
| दो रकअत नफ़्ल | सुन्नत | नीयत से पहले |
| नीयत और तलबिया | शर्त | मीक़ात पर |
| पाबंदियों से बचना | वाजिब | नीयत से बाल कटने तक |
| तवाफ़ (सात चक्कर, चार रुक्न हैं) | रुक्न और वाजिब | काबा के गिर्द |
| तवाफ़ की दो रकअत | वाजिब | मक़ाम के पीछे या मस्जिद में कहीं भी |
| सई | वाजिब | मसआ में, तवाफ़ के बाद |
| बाल मुंडवाना या कतरवाना | वाजिब | सई के बाद |
एहराम
लिबास, एहराम से पहले की सुन्नतें और नीयत अध्याय 6 में बयान हुई हैं। मुख़्तसर: ग़ुस्ल करें, दो साफ़ सफ़ेद चादरें (मर्द) या सादा लिबास (औरतें) पहनें, जिस्म पर ख़ुशबू लगाएँ, दो रकअत पढ़ें, क़िबले की तरफ़ मुँह करें, नीयत करें और तलबिया पढ़ें।
اللَّهُمَّ إِنِّي أُرِيدُ الْعُمْرَةَ فَيَسِّرْهَا لِي وَتَقَبَّلْهَا مِنِّي
उच्चारण Allāhumma innī urīdul-ʿumrata fa-yassirhā lī wa taqabbalhā minnī.
अर्थ ऐ अल्लाह, मैं उमरे का इरादा करता हूँ; इसे मेरे लिए आसान कर दे और मुझसे क़बूल फ़रमा।
لَبَّيْكَ اللّٰهُمَّ لَبَّيْكَ، لَبَّيْكَ لَا شَرِيكَ لَكَ لَبَّيْكَ، إِنَّ الْحَمْدَ وَالنِّعْمَةَ لَكَ وَالْمُلْكَ، لَا شَرِيكَ لَكَ
उच्चारण Labbaik Allāhumma labbaik, labbaika lā sharīka laka labbaik, innal-ḥamda wan-niʿmata laka wal-mulk, lā sharīka lak.
अर्थ हाज़िर हूँ ऐ अल्लाह, हाज़िर हूँ। हाज़िर हूँ, तेरा कोई शरीक नहीं, हाज़िर हूँ। सारी तारीफ़, सारी नेमतें और सारी बादशाही तेरी है। तेरा कोई शरीक नहीं।
उमरे का मीक़ात
मक्का से बाहर से आने वालों के लिए
- यलमलम: यमन की दिशा से।
- ज़ुल-हुलैफ़ा (बिरे-अली): मदीना की दिशा से।
- जुहफ़ा: शाम की दिशा से।
- क़र्नुल-मनाज़िल: नज्द से, और एशिया तथा भारतीय उपमहाद्वीप से उड़कर आने वालों के लिए।
- ज़ाते-इरक़: इराक़ की दिशा से।
मक्का में पहले से मौजूद हाजियों और बाशिंदों के लिए
वे हरम से बाहर हिल्ल (हरम के बाहर की ज़मीन) में जाते हैं:
- जिइर्राना: मस्जिदे-हराम से लगभग 22 किमी।
- तनईम: लगभग 5 किमी; मस्जिदे-आइशा, जिसे ज़्यादातर हाजी इस्तेमाल करते हैं।
- हुदैबिया: शुमैसी के नाम से भी जानी जाती है, लगभग 29 किमी।



एहराम की पाबंदियाँ
नीयत करने और तलबिया कहने के बाद एहराम की पाबंदियाँ लागू हो जाती हैं: सिले कपड़े, सर और चेहरा ढकना (मर्द), चेहरा ढकना (औरतें), ख़ुशबू, बाल हटाना, नाख़ून काटना, शिकार, हरम के पौधे काटना, नज़दीकी और जिमाअ, और झगड़ा। तफ़सील और बदले अध्याय 7 में हैं।
तवाफ़
तवाफ़ काबा के गिर्द सात चक्कर लगाना है। पूरे अहकाम अध्याय 8 में हैं। मुख़्तसर:
- तवाफ़ की आम नीयत करें; उमरे के तवाफ़ के लिए अलग अल्फ़ाज़ ज़रूरी नहीं।
- हजरे-असवद से शुरू करें और वहीं ख़त्म करें; दीवार पर हरी रोशनी उसे निशान करती है।
- मर्द दायाँ कंधा खोलें (इज़तिबा) और पहले तीन चक्करों में तेज़ चलें (रमल)।
- वुज़ू में रहें, सतर ढका हो, और हिज्र के बाहर से चलें।
- तवाफ़ के बाद: मक़ामे-इब्राहीम पर दो रकअत पढ़ें, मुल्तज़म पर दुआ करें, ज़मज़म पिएँ, हजरे-असवद को फिर छुएँ, फिर सई के लिए सफ़ा की तरफ़ जाएँ।

सई
सई सफ़ा और मरवा के बीच सात चक्कर है, सफ़ा से शुरू और मरवा पर ख़त्म। मसआ लगभग 420 मीटर लंबा है। दुआ के लिए अध्याय 9 देखें। सई वाजिब है, और उसके लिए वुज़ू ज़रूरी नहीं।

बाल मुंडवाना या कतरवाना
मर्द पूरा सर मुंडवाएँ (बेहतर) या कम से कम उसका चौथाई कतरवाएँ; औरतें अपने बालों के सिरों से, कम से कम चौथाई बालों में, उँगली के एक पोर के बराबर कतरें (अध्याय 10)। इसके साथ उमरा मुकम्मल हो जाता है और एहराम की हर पाबंदी ख़त्म हो जाती है।
मुक़द्दस सरज़मीन में पहले से मौजूद हाजियों के लिए उमरा
मक्का में मौजूद जो हाजी उमरा करना चाहे वह लगभग 5 किमी दूर मस्जिदे-तनईम जाता है, और फिर:
- वहाँ नीयत करता है और तलबिया कहता है;
- एहराम की पाबंदियों का ख़याल रखता है;
- मस्जिदे-हराम लौटकर तवाफ़ करता है;
- फिर सई;
- फिर बाल मुंडवाता या कतरवाता है।

अगर आप रोक दिए जाएँ, या माहवारी शुरू हो जाए
हनफ़ी मसलक में नीयत में जोड़ी गई शर्त ("अगर मुझे रोका गया तो जहाँ रोका जाऊँ वहीं एहराम से निकल जाऊँगा") का कोई असर नहीं: हाजी सिर्फ़ रोके जाने (इहसार) के अहकाम से निकलता है, क़ुर्बानी का जानवर हरम भेजना और उसके ज़बह होने पर मुंडवाना या कतरवाना (अध्याय 7)।
जिस औरत की माहवारी उमरे का तवाफ़ करने से पहले शुरू हो जाए वह पाक होने तक मस्जिद में दाख़िल नहीं होती और तवाफ़ नहीं करती। वह इंतज़ार करती है; अगर उसका हज क़रीब हो तो वह अपने दीनी रहनुमा से हज की नीयत जोड़ने (क़िरान) या उमरा छोड़ने के बारे में पूछ सकती है (अध्याय 5)। बाक़ी सब कुछ वह कर सकती है।
रुख़सत
तवाफ़े-विदा हज के बाद मीक़ात की हद से बाहर के हाजियों पर वाजिब है। यह उमरे के बाद ज़रूरी नहीं है, लेकिन मक्का छोड़ने से पहले नफ़्ली तवाफ़ करना एक अच्छी रुख़सत है। रुख़सत और मदीना के बारे में और अध्याय 18 में है।

अध्याय 15
औरतों के लिए: सतर, सफ़र के साथी और माहवारी
एहराम में, तवाफ़ में और सई में सतर ढकना; महरम, शौहर की भूमिका, और इद्दत में बैठी औरत; फिर माहवारी के वे मसाइल जो हनफ़ी मसलक में हज में सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं, माहवारी में आप क्या कर सकती हैं, अगर वह तवाफ़े-ज़ियारत से पहले आ जाए तो क्या करें, और उसे टालने के लिए गोलियों का इस्तेमाल।

औरत का सतर
हनफ़ी मसलक में नमाज़ में औरत का सतर उसके चेहरे, हाथों और पाँवों के सिवा पूरा जिस्म है। ढकाव इतना मोटा होना चाहिए कि खाल का रंग छिपा ले। ग़ैर-महरम मर्दों के सामने वह चेहरे और हाथों के सिवा सब कुछ ढकती है (और नमाज़ के बाहर उसके पाँव भी ढके जाते हैं)।
मुकम्मल ढकाव का मतलब है: एक लंबा, ग़ैर-शफ़्फ़ाफ़ दुपट्टा जो सीना ढके; कलाइयों तक आस्तीन वाला लंबा, ढीला कुर्ता; टख़नों तक स्कर्ट या पतलून; मोज़े।
तवाफ़ और सई में
सतर ढकना तवाफ़ की शर्त है; तवाफ़ से पहले ठोड़ी के नीचे, कलाइयों, माथे के बालों और कानों के गिर्द (अगर चश्मा लगाती हैं तो ख़ास ध्यान दें) और अपने मोज़ों की जाँच कर लें। सई में भी ग़ैर-महरम मर्दों के सामने ढके रहना ज़रूरी है।
एहराम में
औरत का एहराम उसका आम सादा लिबास है। चेहरा किसी ऐसी चीज़ से नहीं ढका जाता जो उसे छुए। अगर ग़ैर-मर्द क़रीब हों तो वह कपड़ा या दुपट्टा चेहरे के सामने बिना छुए लटका सकती है।
मर्दों के लिए एक बात
मर्द का सतर नाफ़ से घुटने तक है (घुटना शामिल है)। विपरीत लिंग के कमरों में दाख़िल न हों, अपने जीवनसाथी से मिलने के लिए भी नहीं; बाहर मिलें।
सफ़र के साथी और इजाज़त
महरम
औरत पर हज तभी फ़र्ज़ है जब सफ़र में उसके साथ शौहर या कोई महरम जाने वाला हो (लगभग 77 किमी या उससे ज़्यादा की दूरी)। जिसके पास कोई न हो उस पर जाना लाज़िम नहीं; अगर वह महरम के बिना जाए तो हज सही है मगर सफ़र की वजह से वह गुनहगार है। महरम का बालिग़, आक़िल और भरोसेमंद मुसलमान होना ज़रूरी है। हनफ़ी मसलक महरम की जगह भरोसेमंद औरतों की जमाअत को क़बूल नहीं करता।
शौहर
जब औरत के साथ महरम हो तो शौहर उसे फ़र्ज़ हज (पहली बार) से नहीं रोक सकता; नफ़्ली हज से रोक सकता है। फिर भी उसे उसकी रज़ामंदी लेनी चाहिए और उसके हुक़ूक़ का ख़याल रखना चाहिए।
इद्दत में बैठी औरत
तलाक़ या बेवगी की इद्दत (बेवा की चार महीने दस दिन) में बैठी औरत हज के लिए सफ़र नहीं कर सकती। अगर उसका शौहर तब फ़ौत हो जाए जब वह पहले से मुक़द्दस सरज़मीन में हो, तो वह जहाँ तक हो सके सोग (एहदाद) का ख़याल रखती है, सजावट, ख़ुशबू और बेवजह बाहर निकलने से बचती है, और अपने महरम के साथ अपने मनासिक पूरे करती है।
माहवारी और दूसरा ख़ून
ख़ून की क़िस्में
| क़िस्म | यह क्या है |
|---|---|
| हैज़ (माहवारी) | औरत का फ़ितरी ख़ून, कम से कम तीन दिन-रात, ज़्यादा से ज़्यादा दस |
| निफ़ास | बच्चे की पैदाइश के बाद का ख़ून; ज़्यादा से ज़्यादा चालीस दिन |
| इस्तिहाज़ा | इन हदों से बाहर, या इनके वक़्त के सिवा आने वाला ख़ून; यह बीमारी है, हैज़ नहीं |
हैज़ के बुनियादी मसाइल (हनफ़ी मसलक)
- सबसे कम उम्र: नौ चंद्र वर्ष। इसके ख़त्म होने की आम उम्र पचपन है।
- कम से कम: तीन दिन-रात। ज़्यादा से ज़्यादा: दस दिन-रात। दस से ऊपर जो भी हो वह इस्तिहाज़ा है, और औरत अपनी आदत के मुताबिक़ अपना हैज़ गिनती है।
- दो माहवारियों के बीच कम से कम पाकी: पंद्रह दिन।
- रंग: लाल, काला, पीला, भूरा, हरा और मटमैला सब उसके दिनों के अंदर हैज़ में गिने जाते हैं; सिर्फ़ ख़ालिस सफ़ेद पाकी है।
- ख़ून पूरी तरह रुक जाए तो औरत पाक है; अगर दस दिन से पहले रुक जाए तो वह ग़ुस्ल करके फ़ौरन नमाज़ पढ़े, हालाँकि अपनी आदत के ख़त्म होने तक इंतज़ार करना बेहतर है।
इस्तिहाज़ा
इस्तिहाज़ा वाली औरत (या किसी भी लगातार नापाकी वाली: लगातार स्राव, बेक़ाबू पेशाब) मअज़ूर है: वह हर नमाज़ के वक़्त के लिए एक वुज़ू करती है, जो उस नमाज़ का वक़्त ख़त्म होने तक रहता है, और उस वक़्त में जितनी चाहे फ़र्ज़ और नफ़्ल नमाज़ें पढ़ सकती है और तवाफ़ कर सकती है। वह पैड से जगह साफ़ करके और ढककर किसी भी पाक औरत की तरह नमाज़ पढ़ती, रोज़ा रखती और तवाफ़ करती है।
हवा, स्राव और नमी
- हनफ़ी मसलक में आगे के रास्ते से हवा निकलने से वुज़ू नहीं टूटता।
- बहने वाला सफ़ेद स्राव नापाक है और वुज़ू तोड़ता है; वुज़ू से पहले उसे साफ़ करें।
- आम अंदरूनी नमी नापाक नहीं।
माहवारी के दौरान आप क्या कर सकती हैं और क्या नहीं
हज में जब आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की माहवारी आ गई तो नबी ﷺ ने उनसे फ़रमाया: "वह सब कुछ करो जो हाजी करता है, सिवाय घर के तवाफ़ के।" (बुख़ारी और मुस्लिम में रिवायत है।)
| आप कर सकती हैं | आप नहीं कर सकतीं |
|---|---|
| एहराम की नीयत करना और तलबिया कहना | किसी भी तरह का तवाफ़ करना |
| एहराम के लिए ग़ुस्ल करना | नमाज़ पढ़ना (बाद में उसकी क़ज़ा लाज़िम नहीं) |
| तस्बीह, तकबीर और ज़िक्र करना | रोज़ा रखना (रमज़ान के रोज़ों की क़ज़ा बाद में होती है) |
| अरफ़ात और मुज़दलिफ़ा में रहना और जमरात की रमी करना | मस्जिद (मस्जिदे-हराम समेत) में दाख़िल होना |
| कहीं भी दुआ करना | क़ुरआन छूना या पढ़ना (दुआ के तौर पर आयतें जायज़ हैं) |
| सही तवाफ़ के बाद सई करना | जिमाअ करना, या नाफ़ और घुटनों के बीच छूना |
अगर माहवारी तवाफ़े-ज़ियारत से पहले आ जाए
यही वह हालत है जिससे औरतें सबसे ज़्यादा डरती हैं।
- अगर हो सके तो अपनी हज मिशन से घर की उड़ान टालने को कहें, ताकि आप पाक होने तक इंतज़ार कर सकें, ग़ुस्ल करें और तवाफ़ करें।
- तवाफ़े-ज़ियारत फ़र्ज़ है, इसलिए इसके बिना हज नामुकम्मल है। माहवारी वाली औरत के लिए उसकी वक़्त की हद टाली जा सकती है, और उस देरी पर उस पर दम लाज़िम नहीं, लेकिन तवाफ़ माफ़ नहीं होता। अगर इंतज़ार करना नामुमकिन हो तो अपने आलिम और हज मिशन से पूछें कि कैसे आगे बढ़ें; अकेले फ़ैसला न करें।
- अगर वह तवाफ़े-ज़ियारत किए बिना घर लौट जाए तो उसका हज नामुकम्मल रहता है और शौहर के साथ ताल्लुक़ तब तक नाजायज़ रहता है जब तक वह मक्का लौटकर उसे अदा न कर ले, चाहे जितना वक़्त लगे।
तवाफ़े-विदा
जो औरत मक्का से निकलते वक़्त हैज़ या निफ़ास में हो उसे तवाफ़े-विदा से छूट है: न दम है, न गुनाह।
माहवारी की वजह से रुका उमरा
अगर आपकी माहवारी उमरे के तवाफ़ से पहले शुरू हो जाए तो अध्याय 14 और अध्याय 5 देखें।
माहवारी टालने की गोलियाँ
- ज़्यादातर औरतों के लिए पसंद नहीं की जातीं, तवाफ़ और मस्जिद में दाख़िल होने के सिवा हज का हर अमल माहवारी में अदा किया जा सकता है।
- ज़रूरत हो तो शर्तों के साथ जायज़: किसी भरोसेमंद डॉक्टर से मशवरा करें; दवा आपको नुक़सान न पहुँचाए; और सफ़र से कम से कम तीन महीने पहले इसकी आदत डालना शुरू करें।
व्यावहारिक सलाह:
- अगर आपकी माहवारी में कोई परेशानी नहीं तो गोलियाँ न लें।
- रवानगी से कम से कम तीन महीने पहले डॉक्टर को दिखाएँ।
- हिदायतों पर ठीक-ठीक अमल करें। अपनी सहेलियों की नक़ल न करें।
- गोलियाँ असर न करें तो उसके लिए बैकअप योजना रखें।
- बच्चेदानी के खिसकने या बेक़ाबू पेशाब का इलाज सफ़र से पहले करवा लें।

अध्याय 16
सफ़र में पाकी और नमाज़
हनफ़ी मसलक में वुज़ू और ग़ुस्ल, वुज़ू किसे तोड़ता है, तयम्मुम और पट्टी पर मसह; फिर नमाज़, उसकी शर्तें, फ़र्ज़, वाजिब और सुन्नत अमल और उसे क्या बातिल करता है, जनाज़े की नमाज़, मुसाफ़िर की नमाज़ (क़सर और 15 दिन का क़ायदा), और अरफ़ात व मुज़दलिफ़ा में नमाज़ों को जमा करना।

वुज़ू
वुज़ू जिस्म के कुछ ख़ास हिस्सों को पानी से धोना है (सूरह अल-माइदा 5:6)।
अर्थ ऐ ईमान वालो, जब तुम नमाज़ के लिए उठो (छोटी नापाकी की हालत में), तो अपने चेहरे और अपने हाथ कोहनियों समेत धोओ, अपने सरों का कुछ हिस्सा मसह करो, और अपने पाँव टख़नों समेत धोओ।
सूरह अल-माइदा 5:6
वुज़ू के फ़र्ज़ अमल
- चेहरा धोना, बालों की जड़ से ठोड़ी तक और एक कान से दूसरे कान तक।
- दोनों बाज़ू धोना, कोहनियों समेत।
- गीले हाथों से सर के चौथाई हिस्से का मसह करना।
- दोनों पाँव धोना, टख़नों समेत।
वुज़ू की सुन्नतें
- नीयत।
- बिस्मिल्लाह कहना।
- पहले दोनों हाथ कलाइयों तक धोना।
- मिसवाक (मिसवाक) इस्तेमाल करना।
- कुल्ली करना और नाक में पानी डालना।
- घनी दाढ़ी का ख़िलाल करना, और हाथ-पाँव की उँगलियों के बीच भी।
- पूरे सर का एक बार मसह करना, और कानों का।
- दाएँ को बाएँ से पहले धोना, तरतीब से और बिना रुके।
- तीन-तीन बार धोना।
- वुज़ू के बाद की दुआ पढ़ना।
आप स्प्रे या छोटी बोतल इस्तेमाल कर सकते हैं, बशर्ते पानी खाल पर बहे।
أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلٰهَ إِلَّا اللّٰهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ، اللّٰهُمَّ اجْعَلْنِي مِنَ التَّوَّابِينَ وَاجْعَلْنِي مِنَ الْمُتَطَهِّرِينَ
उच्चारण Ash-hadu an lā ilāha illallāhu waḥdahū lā sharīka lah, wa ash-hadu anna Muḥammadan ʿabduhū wa rasūluh. Allāhummajʿalnī minat-tawwābīna wajʿalnī minal-mutaṭahhirīn.
अर्थ मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद उसके बंदे और रसूल हैं। ऐ अल्लाह, मुझे तौबा करने वालों में से और पाक रहने वालों में से बना दे।
वुज़ू किसे तोड़ता है
- आगे या पीछे के रास्ते से कुछ भी निकलना, पेशाब, पाख़ाना, हवा, और ऐसी चीज़ें।
- जिस्म के किसी भी हिस्से से बहता ख़ून या पीप।
- मुँह भर क़ै।
- लेटकर या टेक लगाकर सोना।
- बेहोशी, पागलपन या नशा।
- रुकूअ और सजदे वाली नमाज़ में ज़ोर की हँसी (इससे वुज़ू और नमाज़ दोनों टूट जाते हैं)।
ग़ुस्ल
ग़ुस्ल के फ़र्ज़ अमल तीन हैं: कुल्ली करना, नाक में पानी डालना, और पूरे जिस्म को इस तरह धोना कि कोई हिस्सा सूखा न रहे। यह जनाबत के बाद, और माहवारी व निफ़ास का ख़ून रुकने के बाद ज़रूरी है।
तयम्मुम
तयम्मुम वुज़ू या ग़ुस्ल की जगह साफ़ मिट्टी से चेहरे और बाज़ुओं का मसह करना है।
कब जायज़ है
- लगभग एक मील के अंदर पानी न हो (क़रीब 1.5 किमी), और तलाश के बाद भी न मिले।
- कोई बीमारी जो पानी से बढ़ जाए; या बहुत ठंडा मौसम जिसमें पानी गर्म करने का कोई ज़रिया न हो।
- आपके और पानी के बीच दुश्मन या किसी जानवर का डर।
कैसे
- नमाज़ जायज़ करने के लिए पाकी हासिल करने की तयम्मुम की नीयत करें।
- दोनों हाथ साफ़ मिट्टी (ज़मीन, रेत, पत्थर या चिकनी मिट्टी) पर हल्के से मारें और पूरे चेहरे का मसह करें।
- दोबारा मारें और दोनों बाज़ुओं का कोहनियों तक मसह करें।
पट्टी पर मसह (जबीरा)
प्लास्टर, ड्रेसिंग या पट्टी के ऊपर, उसके नीचे के हिस्से को धोने की जगह पानी से मसह करें (मसह पट्टी के बड़े हिस्से पर हो सकता है)। इसके अलावा तयम्मुम की ज़रूरत नहीं, और नमाज़ें दोहराने की ज़रूरत नहीं।
नमाज़
नमाज़ वह इबादत है जो बंदे को उसके रब से जोड़ती है, ऐसे अल्फ़ाज़ और अफ़आल से बनी जो तकबीर से शुरू होते और सलाम पर ख़त्म होते हैं।
अर्थ "क़ियामत के दिन बंदे से जिस अमल का सबसे पहले हिसाब लिया जाएगा वह नमाज़ है। अगर उसकी नमाज़ ठीक रही तो उसके सारे अमल ठीक रहे, और अगर नहीं तो इसके उलट।"
हदीस, तबरानी में रिवायत है
नमाज़ की शर्तें
- छोटी और बड़ी नापाकी से पाकी।
- जिस्म, कपड़ों और जगह का गंदगी से पाक होना।
- सतर ढकना।
- क़िबले की तरफ़ मुँह करना।
- नमाज़ का वक़्त।
- नीयत।
- शुरुआती तकबीर (तकबीरे-तहरीमा), ऐसी शर्त जो नमाज़ से जुड़ी है।
नमाज़ के फ़र्ज़ अमल (अरकान)
- खड़ा होना, जो इसकी ताक़त रखता हो।
- क़ुरआन का कुछ हिस्सा पढ़ना, कम से कम एक आयत।
- रुकूअ (रुकूअ)।
- सजदा (सुजूद), हर रकअत में दो बार।
- आख़िरी क़ादा, तशह्हुद की मिक़दार भर।
नमाज़ के वाजिब अमल
- फ़र्ज़ नमाज़ों की पहली दो रकअतों में, और नफ़्ल व वित्र की हर रकअत में अल-फ़ातिहा और एक सूरह पढ़ना।
- हर रुक्न में इत्मीनान और ठहराव (तादीले-अरकान)।
- तीन और चार रकअत वाली नमाज़ों में पहला क़ादा और उसमें तशह्हुद।
- आख़िरी क़ादे में तशह्हुद।
- सलाम, अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह के अल्फ़ाज़ के साथ।
- इमाम के लिए फ़ज्र, मग़रिब और इशा में बुलंद आवाज़ से, और ज़ुहर व अस्र में आहिस्ता पढ़ना।
- वित्र में क़ुनूत।
भूल से कोई वाजिब छूट जाए तो भूल का सजदा (सजदए-सह्व) लाज़िम है।
नमाज़ की सुन्नतें
- शुरुआती तकबीर पर हाथ कानों तक उठाना; मर्द उन्हें नाफ़ के नीचे बाँधते हैं, औरतें सीने पर।
- शुरुआती दुआ (सना), तअव्वुज़ और बिस्मिल्लाह आहिस्ता।
- आमीन आहिस्ता कहना।
- हर हरकत पर तकबीर कहना; रुकूअ और सजदे में कम से कम तीन तस्बीहें।
- रुकूअ में हथेलियाँ घुटनों पर रखना।
- बाएँ पाँव पर बैठना और दायाँ पाँव खड़ा रखना।
- आख़िरी क़ादे में नबी ﷺ पर दरूद भेजना और आख़िरी दुआ।
नमाज़ को क्या बातिल करता है
- बात करना, चाहे थोड़ी ही।
- खाना या पीना।
- बहुत हरकत (लगातार तीन या ज़्यादा)।
- सीने को क़िबले से फेरना।
- ज़ोर से हँसना।
- वुज़ू टूट जाना, या एक रुक्न की मिक़दार भर सतर खुल जाना।
- दुनियावी ग़म में ऊँची आवाज़ से रोना।
- इमाम से आगे बढ़ जाना।
जिन वक़्तों में नमाज़ मना है
- सूरज निकलते वक़्त से उसके ऊपर चढ़ने तक; ठीक दोपहर (ज़वाल का वक़्त) से उसके ढलने तक; सूरज डूबते वक़्त से उसके डूबने तक, कोई नमाज़ नहीं, सिवाय इसके कि उसी दिन की अस्र सूरज डूबते वक़्त पढ़ी जा सकती है।
- फ़ज्र के बाद सूरज निकलने तक, और अस्र के बाद सूरज डूबने तक: कोई नफ़्ल नमाज़ नहीं, लेकिन क़ज़ा नमाज़ें, जनाज़े की नमाज़ और तवाफ़ की दो रकअत उस वक़्त के बाद पढ़ी जा सकती हैं। ख़ास तौर पर तवाफ़ की दो रकअत मना वक़्त के गुज़र जाने तक टाली जाती हैं।
जनाज़े की नमाज़
- हुक्म: फ़र्ज़े-किफ़ाया (फ़र्ज़े-किफ़ाया)।
- दोनों मुक़द्दस मस्जिदों में यह अक्सर फ़र्ज़ नमाज़ों के फ़ौरन बाद होती है।
यह कैसे पढ़ी जाती है
यह खड़े होकर, चार तकबीरों के साथ, बिना रुकूअ और सजदे के पढ़ी जाती है:
- पहली तकबीर के बाद: सना (सुब्हानकल्लाहुम्म…)।
- दूसरी के बाद: नबी ﷺ पर दरूद।
- तीसरी के बाद: मरहूम के लिए दुआ।
- चौथी के बाद: दाएँ और बाएँ सलाम।
اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لِحَيِّنَا وَمَيِّتِنَا وَشَاهِدِنَا وَغَائِبِنَا وَصَغِيرِنَا وَكَبِيرِنَا وَذَكَرِنَا وَأُنْثَانَا. اللّٰهُمَّ مَنْ أَحْيَيْتَهُ مِنَّا فَأَحْيِهِ عَلَى الْإِسْلَامِ، وَمَنْ تَوَفَّيْتَهُ مِنَّا فَتَوَفَّهُ عَلَى الْإِيمَانِ
उच्चारण Allāhummaghfir li-ḥayyinā wa mayyitinā, wa shāhidinā wa ghā'ibinā, wa ṣaghīrinā wa kabīrinā, wa dhakarinā wa unthānā. Allāhumma man aḥyaytahū minnā fa-aḥyihi ʿalal-islām, wa man tawaffaytahū minnā fatawaffahu ʿalal-īmān.
अर्थ ऐ अल्लाह, हमारे ज़िंदा और हमारे मुर्दा को, हमारे हाज़िर और हमारे ग़ायब को, हमारे छोटे और हमारे बड़े को, हमारे मर्द और हमारी औरत को बख़्श दे। ऐ अल्लाह, हममें से जिसे तू ज़िंदा रखे उसे इस्लाम पर ज़िंदा रख, और हममें से जिसे तू वफ़ात दे उसे ईमान पर वफ़ात दे।
अबू दाऊद और तिर्मिज़ी में रिवायत है
जुमे की नमाज़
- जुमे की नमाज़ औरतों या मुसाफ़िरों पर फ़र्ज़ नहीं, और न बीमारों पर।
- अगर मुसाफ़िर या औरत उसे पढ़े तो वह सही है और ज़ुहर की जगह ले लेती है।
- जो औरतें शरीक हों वे अपने लिए मख़सूस जगह में बैठती हैं।
मुसाफ़िर की नमाज़: क़सर और 15 दिन का क़ायदा
हनफ़ी मसलक में मुसाफ़िर के लिए क़सर रियायत नहीं बल्कि क़ायदा है: वह चार रकअत वाली फ़र्ज़ नमाज़ों (ज़ुहर, अस्र, इशा) की जगह दो रकअत पढ़ता है, और बाक़ी नमाज़ें वैसी ही रहती हैं। उसे चार पढ़ने का इख़्तियार नहीं।
- सफ़र लगभग 77 किमी (तीन दिन की मसाफ़त) या उससे ज़्यादा की दूरी का है।
- मुसाफ़िर घर पहुँचने तक या जब तक वह किसी एक जगह 15 दिन या उससे ज़्यादा ठहरने की नीयत न कर ले तब तक क़सर पढ़ता है; उसके बाद से वह मुक़ीम (मुक़ीम) है और पूरी पढ़ता है।
- इसलिए जिस हाजी की ऐसी नीयत नहीं वह मक्का, मिना, अरफ़ात, मुज़दलिफ़ा और मदीना में मुसाफ़िर है, और अकेले पढ़ते हुए या इमामत करते हुए क़सर पढ़ता है। अगर वह उस नीयत से मक्का में 15 दिन या ज़्यादा ठहरे तो वहाँ पूरी पढ़ता है।
- मुक़ीम इमाम के पीछे (जैसा हरम की मस्जिदों में) मुसाफ़िर उसकी पैरवी करता है और चार रकअत पढ़ता है; मुसाफ़िर इमाम के पीछे, मुक़ीम इमाम के सलाम के बाद अपनी चार पूरी करता है।
- मक्का का रहने वाला मिना या अरफ़ात में पूरी पढ़ता है।
नमाज़ों को जमा करना
हनफ़ी मसलक में दो नमाज़ों को एक वक़्त में जमा करना नहीं है, सिवाय दो सूरतों के, दोनों एहराम में और हज के इमाम के पीछे:
- अरफ़ात में: ज़ुहर और अस्र ज़ुहर के वक़्त में जमा होती हैं (अध्याय 11)।
- मुज़दलिफ़ा में: मग़रिब और इशा इशा के वक़्त में जमा होती हैं (अध्याय 12)।
दूसरे वक़्तों में हर नमाज़ अपने वक़्त में पढ़ें। जब सफ़र मुश्किल हो तो आप ज़ाहिरी जमा कर सकते हैं: पहली नमाज़ उसके वक़्त के बिल्कुल आख़िर में और दूसरी उसके वक़्त के बिल्कुल शुरू में पढ़ें।
बीमारी में नमाज़
खड़े होकर पढ़ें; न हो सके तो बैठकर; न हो सके तो पीठ या करवट के बल लेटकर, रुकूअ और सजदे का सर से इशारा करते हुए और सजदे को रुकूअ से नीचा रखते हुए। जो हाजी पाकी हासिल करने के लिए पानी या मिट्टी न पा सके वह अपने दीनी रहनुमा से पूछे कि कैसे पढ़े और बाद में उसकी क़ज़ा करे।
मुक़द्दस मस्जिदों में
- तहिय्यतुल-मस्जिद की दो रकअत पढ़ें।
- दाख़िल होते वक़्त नफ़्ली एतिकाफ़ की नीयत करें।
- बहुत सी नफ़्ल नमाज़ें पढ़ें और क़ुरआन की तिलावत करें।
- अल्लाह का ज़िक्र करें और सदक़ा दें।
- वुज़ू की हालत में रहें, और दुआ करते वक़्त क़िबले की तरफ़ मुँह रखें।
नमाज़ के बारे में तंबीहात
1. नमाज़ छोड़ना बहुत बड़ा गुनाह है।
अर्थ "तुम्हें सक़र (जहन्नम) में किस चीज़ ने डाला?" वे कहेंगे: "हम नमाज़ पढ़ने वालों में से न थे।"
सूरह अल-मुदस्सिर 74:42–43
2. नमाज़ में देर करना बिना ऐसे उज़्र के जो शरीअत में क़बूल हो, बड़ा गुनाह है। "बेशक नमाज़ ईमान वालों पर मुक़र्रर वक़्तों में फ़र्ज़ की गई है" (अन-निसा 4:103)।
3. जमाअत से न पढ़ना मस्जिदे-हराम और मस्जिदे-नबवी में। जमाअत सुन्नते-मुअक्कदा है, वाजिब के क़रीब।
4. बिना इत्मीनान के पढ़ना। हर रुक्न में इत्मीनान वाजिब है। इसका मतलब है रुकूअ में ठहराव, उसके बाद खड़ा होना, सजदा, और दो सजदों के बीच का बैठना, और एक रुक्न से दूसरे की तरफ़ जल्दबाज़ी न करना।

अध्याय 17
सेहत और हिफ़ाज़त
हज के सफ़र में तंदुरुस्त रहने के व्यावहारिक नुक्ते, जाने से पहले, गर्मी और भीड़ में, और मशाइर में, ताकि बीमारी आपको इबादत पूरी करने से न रोके।

जाने से पहले
- अपनी सेहत की जाँच जल्दी पूरी करें, और अपनी हर बीमारी के बारे में सच-सच बताएँ।
- सफ़र से पहले परेशानियों का इलाज करवा लें, औरतों की सेहत की परेशानियाँ भी, रवानगी से कम से कम तीन महीने पहले (अध्याय 15)।
- टीके: अपने मौसम के लिए ज़रूरी हर टीका लगवाएँ (हज वीज़ा के लिए मेनिंगोकोकल टीका लंबे अरसे से ज़रूरी रहा है) और कोई भी और जो आपका स्वास्थ्य विभाग सुझाए। ज़रूरतें बदलती रहती हैं, इसलिए अपनी आधिकारिक हिदायतों पर चलें।
- तंदुरुस्त हो जाएँ। हज में रोज़ाना कई किलोमीटर पैदल चलना होता है। रवानगी से हफ़्तों पहले रोज़ चलना शुरू करें, उन्हीं चप्पलों में जो आप पहनेंगे।
- दवाएँ: अपने पूरे क़याम के लिए काफ़ी और कुछ अतिरिक्त, अपनी मूल पैकिंग में, और उन्हें गिनाते डॉक्टर के पत्र के साथ लाएँ। कुछ दिनों की ख़ुराक अपने हैंड-बैग में रखें।
अपनी दवाएँ लेते रहें
ज़मज़म शिफ़ा का ज़रिया है, लेकिन जो हाजी पहले से बीमार हैं उन्हें अपनी दवाएँ वक़्त पर लेते रहना चाहिए और मेडिकल अफ़सरों की सलाह माननी चाहिए। यह तवक्कुल का हिस्सा है, अल्लाह पर भरोसा करते हुए उसके दिए असबाब को इस्तेमाल करना, उसकी कमी नहीं (अध्याय 4)।
- अपनी ख़ुराकों के लिए अलार्म लगाएँ: हज के दिन हर दिनचर्या बदल देते हैं।
- अगर आप डायबिटीज़ के मरीज़ हैं तो मिठाई और अपना ग्लूकोज़ मीटर साथ रखें; खाना देर से मिल सकता है।
- अगर आप इंसुलिन या ऐसी दवाएँ इस्तेमाल करते हैं जिन्हें ठंडा रखना है, तो अपने समूह से पूछें कि मशाइर में उन्हें कैसे रखा जाएगा।
गर्मी
- थोड़ा-थोड़ा करके बार-बार पानी पिएँ: प्यास लगने का इंतज़ार न करें।
- धूप में छाता इस्तेमाल करें। (एहराम में छाता जायज़ है; उसे सर से बाँधना नहीं।)
- दोपहर के बाद अरफ़ात में साये में रहें; आपका ख़ेमा वुक़ूफ़ की जायज़ जगह है।
- जब हो सके ठंडे वक़्तों में चलें।
- ख़तरे की निशानियाँ जानें: सरदर्द, चक्कर, मतली, उलझन, बहुत गर्म खाल, या पसीना आना बंद हो जाना। साये में चले जाएँ, जिस्म को पानी से ठंडा करें और फ़ौरन चिकित्सा मदद लें।

भीड़
- तवाफ़, सई और जमरात के लिए उन वक़्तों पर जाएँ जो आपका समूह तय करे, और तय रास्ते इस्तेमाल करें।
- कभी धक्का न दें। भीड़ में सब्र आपकी इबादत का हिस्सा है, और सबसे महफ़ूज़ चीज़ जो आप कर सकते हैं।
- अपना बैग आगे रखें। तंग रास्ते में अचानक न रुकें।
- अगर भीड़ में आपको चक्कर आए तो आस-पास वालों को इशारा करें और बहाव के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि बग़ल में किनारे की तरफ़ बढ़ें।
पाँव और चलना
- ऐसी चप्पलें इस्तेमाल करें जिन्हें आप पहले से पहन चुके हों। एहराम में मर्दों के लिए उन्हें पाँव का ऊपरी हिस्सा खुला रखना चाहिए।
- रोज़ाना अपने पाँवों में छालों और कटों की जाँच करें, ख़ासकर अगर आप डायबिटीज़ के मरीज़ हैं।
- पट्टियाँ और बिना ख़ुशबू की क्रीम की एक छोटी ट्यूब साथ रखें।
इंफ़ेक्शन
- भीड़ वाले ख़ेमों, बसों और कमरों में खाँसी, ज़ुकाम और फ़्लू आसानी से फैलते हैं। अपने हाथ अक्सर धोएँ और भीड़ में मास्क पहनने पर विचार करें।
- जब बाल कटवाएँ या मुंडवाएँ तो उस्तरे या ब्लेड साझा न करें (अध्याय 10)।
- ताज़ा पका हुआ खाना खाएँ, और धूप में छोड़े गए खाने से सावधान रहें।
वुज़ू, नमाज़ और बीमारी
- अगर पानी आपको नुक़सान पहुँचाए तो तयम्मुम जायज़ है, और पट्टी वाला शख़्स उस पर मसह करता है (अध्याय 16)।
- बीमार शख़्स खड़े होकर नमाज़ पढ़े अगर कर सके, वरना बैठकर, वरना लेटकर।
- अगर आप बीमारी की वजह से रमी न कर सकें तो मेडिकल अफ़सर और अपने दीनी रहनुमा से सलाह के बाद कोई नुमाइंदा आपकी तरफ़ से रमी कर सकता है (अध्याय 13)।
- बीमार शख़्स या उसकी देखभाल करने वालों को मुज़दलिफ़ा में जल्दी निकलने और उसके तय वक़्त के वुक़ूफ़ से छूट है (अध्याय 12)।
मदद पाना
- जान लें कि आपके समूह का क्लिनिक और मेडिकल अफ़सर मक्का, मदीना और मशाइर में कहाँ हैं।
- अपना आईडी कार्ड, रिस्टबैंड और ख़ेमे या कमरे का कार्ड हर वक़्त साथ रखें, और अपनी बीमारियों और दवाओं का एक नोट।
- अगर अपने समूह से बिछड़ जाएँ तो सबसे क़रीबी गाइड पोस्ट, सुरक्षा अफ़सर या अपने देश के मिशन दफ़्तर के पास जाएँ।

अध्याय 18
तवाफ़े-विदा और मदीना की ज़ियारत
रुख़सती का तवाफ़ (तवाफ़ुस-सदर): किस पर लाज़िम है, किसे छूट है, छूट जाए तो क्या होता है, और उसके बाद क्या करें। फिर मदीना: शहर और मस्जिदे-नबवी की फ़ज़ीलतें, नबी ﷺ और आपके दोनों साथियों की ज़ियारत, मदीना में मुसाफ़िर की नमाज़, बक़ीअ, क़ुबा, क़िब्लतैन, उहुद और दूसरी तारीख़ी जगहें।

तवाफ़े-विदा और उसका हुक्म
तवाफ़े-विदा (जिसे तवाफ़ुस-सदर भी कहते हैं) रुख़सती का तवाफ़ है जो हज के बाद मक्का छोड़ने वाला हाजी करता है। हनफ़ी मसलक में यह उस हाजी पर वाजिब है जो मीक़ात की हद से बाहर से आया हो (आफ़ाक़ी), चाहे उसने इफ़राद, तमत्तु या क़िरान किया हो। यह मक्का के रहने वाले या मीक़ात की हद के अंदर रहने वाले पर वाजिब नहीं, और सिर्फ़ उमरे के बाद ज़रूरी नहीं।
- यह तवाफ़े-ज़ियारत के बाद किसी भी वक़्त किया जा सकता है, लेकिन रवानगी के ऐन वक़्त करना बेहतर है। तवाफ़े-ज़ियारत के बाद किया गया कोई नफ़्ली तवाफ़ उसकी जगह काफ़ी है, चाहे विदा की नीयत न की हो। जब तक आप मक्का में हैं, तवाफ़, उमरा, ज़िक्र और इबादत में हर लम्हे की क़द्र करें, मगर 13 तारीख़ के बाद तक उमरा न करें।
- यह दूसरे तवाफ़ों की तरह सात चक्कर है, बिना रमल और बिना इज़तिबा के।
- इसके बाद मक़ामे-इब्राहीम पर दो रकअत पढ़ें, क़िबले की तरफ़ मुँह करके तीन घूँट में ज़मज़म पिएँ, फिर मुल्तज़म पर जाएँ, अपना सीना और दायाँ गाल दीवार से लगाएँ, आजिज़ी के साथ माफ़ी माँगें और जितनी देर हो सके दुआ करें; फिर हजरे-असवद को छुएँ और ग़मगीन दिल के साथ रवाना हों।
अगर न किया जाए
| हालत | दम |
|---|---|
| उज़्र वाला (नीचे देखें) | नहीं |
| किसी और वजह से उसके बिना निकल गया और आगे सफ़र कर गया (मसलन उसके बिना घर लौट गया) | हाँ, एक भेड़ |
| निकल गया, मगर मीक़ात पहुँचने से पहले लौट आया और उसे अदा किया | नहीं |
तवाफ़े-विदा से छूट के उज़्र
माहवारी या निफ़ास वाली औरत को छूट है: न दम, न गुनाह। जो हाजी बीमारी, जान या हिफ़ाज़त के डर, या निकलने पर मजबूर होने की वजह से इसे अदा न कर सके उसे भी फ़ुक़हा के मुताबिक़ छूट है; अपने दीनी रहनुमा से पूछें।
तवाफ़े-विदा की तैयारी
- अपने समूह के दफ़्तर से रवानगी की तफ़सील लें, कि आप घर जा रहे हैं या मदीना।
- अपने तवाफ़ से पहले ज़रूरी चीज़ें ख़रीद लें और सामान पैक कर लें। अपना सामान लदवाने के लिए नीचे ले आएँ।
- बस के रवाना होने से कुछ घंटे पहले, जैसा आपका दफ़्तर बताए, वुज़ू करके हरम जाएँ।
- इसके लिए एहराम नहीं पहना जाता।
अर्थ "मैं अल्लाह तआला की ख़ातिर रुख़सती का तवाफ़ (तवाफ़े-विदा), सात चक्कर, करने का इरादा करता हूँ; इसे मेरे लिए आसान कर दे और मुझसे क़बूल फ़रमा।"

तवाफ़े-विदा के बाद
फ़ौरन निकल जाना सबसे बेहतर (मुस्तहब) है, लेकिन थोड़ी देर ठहरने पर कोई दम नहीं, और तवाफ़े-विदा के बाद हाजी नमाज़ या तवाफ़ के लिए मस्जिदे-हराम में फिर दाख़िल हो सकता है। आप कर सकते हैं:
- तवाफ़ की दो रकअत पढ़ना, ज़मज़म पीना, दुआ करना;
- सफ़र के लिए ज़रूरी चीज़ें ख़रीदना, खाना खाना, और बस का इंतज़ार करना;
- किसी बिछड़े साथी को ढूँढना या किसी बीमार की देखभाल करना।
अगर इसके बाद आप मक्का में लंबे वक़्त तक रुकें तो बेहतर है कि आख़िर में तवाफ़ फिर दोहराएँ।
मदीना

हम मदीना की ज़ियारत क्यों करते हैं
मस्जिदे-नबवी की ज़ियारत और नबी ﷺ को सलाम करना बहुत ताकीदी मुस्तहब (मुस्तहबे-मुअक्कद) है; कुछ हनफ़ी फ़ुक़हा कहते हैं कि यह वाजिब के क़रीब है। यह हज या उमरे का हिस्सा नहीं है। हम नबी ﷺ और आपके साथियों से और ज़्यादा मुहब्बत करने, मदीना से इस्लाम फैलाने में उनकी तकलीफ़ों और क़ुर्बानियों का शुक्र अदा करने, और तक़वा में तरक़्क़ी पाने के लिए ज़ियारत करते हैं।
मदीना की फ़ज़ीलतें
صَلَاةٌ فِي مَسْجِدِي هٰذَا خَيْرٌ مِنْ أَلْفِ صَلَاةٍ فِيمَا سِوَاهُ إِلَّا الْمَسْجِدَ الْحَرَامَ
उच्चारण Ṣalātun fī masjidī hādhā khairun min alfi ṣalātin fīmā siwāhu illal-masjidal-ḥarām.
अर्थ मेरी इस मस्जिद में एक नमाज़ किसी भी दूसरी मस्जिद की एक हज़ार नमाज़ों से बेहतर है, सिवाय मस्जिदे-हराम के।
बुख़ारी और मुस्लिम में रिवायत है
मदीना में मौत: "जो मदीना में मरने की ताक़त रखता हो वह वहीं मरे, क्योंकि मैं मदीना में मरने वालों की शफ़ाअत करूँगा।"
मदीना में सब्र: "मेरी उम्मत में से जो मदीना की सख़्तियों और मुश्किलों पर सब्र करे, मैं क़ियामत के दिन उसका शफ़ीअ या गवाह बनूँगा।"

मदीना में आपकी नमाज़ें
हनफ़ी मसलक में जो हाजी मदीना में 15 दिन या उससे ज़्यादा ठहरने की नीयत नहीं रखता वह वहाँ मुसाफ़िर रहता है: अकेले पढ़ते हुए या इमामत करते हुए चार रकअत वाली नमाज़ें दो रकअत पढ़ता है। जब वह मस्जिद के इमाम के पीछे (जो मुक़ीम है) पढ़ता है तो उसकी पैरवी करता है और चार पढ़ता है। वह दो नमाज़ों को कभी एक वक़्त में जमा नहीं करता (अध्याय 16)।
मस्जिदे-नबवी की ज़ियारत
ज़ियारत में रौज़ा और नबी ﷺ व आपके दोनों साथियों की क़ब्रों पर सलाम करना शामिल है। ज़ायरीन के लिए गाइड हाजियों को ज़ियारत करवाएँगे।
مَا بَيْنَ بَيْتِي وَمِنْبَرِي رَوْضَةٌ مِنْ رِيَاضِ الْجَنَّةِ
उच्चारण Mā baina baitī wa minbarī rauḍatun min riyāḍil-jannah.
अर्थ मेरे घर और मेरे मिंबर के बीच का हिस्सा जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ है।
बुख़ारी और मुस्लिम में रिवायत है
- मर्द आम तौर पर बाबुस-सलाम से दाख़िल होते हैं, हो सके तो रौज़ा में नमाज़ पढ़ते हैं, और फिर क़ब्रों के सामने से गुज़रते हैं, नबी ﷺ को सलाम देते हैं, फिर अबू बक्र को और फिर उमर को, और रवाना हो जाते हैं।
- औरतों का अपना दाख़िला और रास्ता है, और वे तय वक़्तों पर ज़ियारत करती हैं। आज रौज़ा में दाख़िला बुक किए गए परमिट से होता है (सरकारी Nusuk ऐप के ज़रिए), मर्दों और औरतों दोनों के लिए। मौजूदा इंतज़ाम और अपने समूह की रहनुमाई पर चलें।


السَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُولَ اللّٰهِ
उच्चारण As-salāmu ʿalaika yā Rasūlallāh.
अर्थ आप पर सलामती हो, ऐ अल्लाह के रसूल।
السَّلَامُ عَلَيْكَ يَا أَبَا بَكْرٍ، السَّلَامُ عَلَيْكَ يَا عُمَرُ
उच्चारण As-salāmu ʿalaika yā Abā Bakr. As-salāmu ʿalaika yā ʿUmar.
अर्थ आप पर सलामती हो, ऐ अबू बक्र। आप पर सलामती हो, ऐ उमर।
मदीना की तारीख़ी जगहें
मस्जिदे-नबवी, नबी ﷺ की क़ब्र, रौज़ा, बक़ीअ, मस्जिदे-क़ुबा, मस्जिदे-क़िब्लतैन, उहुद के शहीदों की क़ब्रें, सात मस्जिदें, जबले-रुमाह और खजूर का बाज़ार वे जगहें हैं जहाँ आम तौर पर जाया जाता है।
बक़ीअ
मस्जिदे-नबवी के बराबर का क़ब्रिस्तान जहाँ नबी ﷺ के घरवालों और सहाबा में से बहुत से दफ़्न हैं।
السَّلَامُ عَلَيْكُمْ أَهْلَ الدِّيَارِ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُسْلِمِينَ، وَإِنَّا إِنْ شَاءَ اللّٰهُ بِكُمْ لَلَاحِقُونَ، نَسْأَلُ اللّٰهَ لَنَا وَلَكُمُ الْعَافِيَةَ
उच्चारण As-salāmu ʿalaikum ahlad-diyāri minal-mu'minīna wal-muslimīn, wa innā in shā'allāhu bikum la-lāḥiqūn, nas'alullāha lanā wa lakumul-ʿāfiyah.
अर्थ तुम पर सलामती हो ऐ इन घरों वालो, मोमिनो और मुसलमानो। और हम, इंशाअल्लाह, तुमसे मिलने वाले हैं। हम अल्लाह से अपने लिए और तुम्हारे लिए आफ़ियत माँगते हैं।
मुस्लिम में रिवायत है

मस्जिदे-क़ुबा
- क़ुबा गाँव में, मदीना से लगभग 3 किमी दक्षिण में।
- इस्लाम के इतिहास में बनी पहली मस्जिद: "जो मस्जिद पहले दिन से तक़वा पर क़ायम की गई वह इसकी ज़्यादा हक़दार है कि तुम उसमें खड़े हो" (सूरह अत-तौबा 9:108)।
- नबी ﷺ हर सनीचर को क़ुबा जाया करते थे, सवार होकर या पैदल।
- नबी ﷺ ने फ़रमाया: "जो अपने घर में पाकी हासिल करे, फिर मस्जिदे-क़ुबा आए और उसमें नमाज़ पढ़े, उसे उमरे के बराबर सवाब मिलेगा" (इब्ने-माजा में रिवायत है)।
हिजरत में नबी ﷺ क़ुबा पहुँचे और चार दिन ठहरे। पहले ही दिन आपने मस्जिद की तामीर शुरू की और सहाबा के साथ ईंटें और रेत उठाई।


मस्जिदे-क़िब्लतैन
"दो क़िबलों की मस्जिद", जहाँ क़िबला मस्जिदे-अक़सा से काबा की तरफ़ बदलने का हुक्म आया।


सात मस्जिदें
ग़ज़वए-ख़ंदक़ (अल-ख़ंदक़) की जगह पर छोटी मस्जिदों का एक समूह।

उहुद, शहीदों का क़ब्रिस्तान और जबले-रुमाह
उहुद पहाड़, मदीना के उत्तर में, जहाँ ग़ज़वए-उहुद लड़ी गई, और उहुद के शहीदों की क़ब्रें, जिनमें हमज़ा बिन अब्दुल-मुत्तलिब हैं। इसके सामने जबले-रुमाह है, तीरंदाज़ों की छोटी पहाड़ी।


खजूर का बाज़ार
मदीना की खजूरें मशहूर हैं। खजूर का बाज़ार घर जाने से पहले की एक पसंदीदा आख़िरी मंज़िल है।

अध्याय 19
योजना और व्यावहारिक बातें
सफ़र का व्यावहारिक पहलू: रजिस्ट्रेशन और इंतज़ाम, क्या पैक करें, फ़र्ज़, वाजिब और सुन्नत अमल का ख़ुलासा, अधूरा नफ़्ली हज या उमरा, हज में मन्नतें (नज़्र), और लौटने के बाद अपने हज को मब्रूर बनाए रखना।

हज का इंतज़ाम
सफ़र में आपके देश की हज संस्था शामिल होती है। आम तौर पर:
- रजिस्ट्रेशन और किसी मौसम के लिए बुलाए जाने के लिए अपनी बारी का इंतज़ार।
- अपने पैकेज या श्रेणी के लिए पेशकश क़बूल करना और ख़र्च अदा करना।
- सेहत की जाँच और ज़रूरी टीके (अध्याय 17)।
- अपने समुदाय में हज कोर्स में शामिल होना, मनासिक के अमली अभ्यास के साथ।
- अपने सफ़र के दस्तावेज़, वीज़ा, आईडी कार्ड, रिस्टबैंड और सामान के टैग, और अपनी उड़ान की तफ़सील हासिल करना।
- तय तारीख़ पर रवानगी, अगर आप सीधे जद्दा जा रहे हैं तो एहराम में (अध्याय 6)।
क्या पैक करें
इबादत
- एहराम के दो या तीन जोड़े (मर्द) या मुनासिब कपड़ों के कई जोड़े, मोज़े और दुपट्टा (औरतें)।
- एहराम की बेल्ट या थैली; ऐसी चप्पलें जो पाँव का ऊपरी हिस्सा खुला रखें।
- एक छोटी जायनमाज़, जेबी क़ुरआन, और दुआओं की एक किताब जो आप समझते हों।
- वुज़ू के लिए स्प्रे बोतल या छोटी पानी की बोतल (अध्याय 16)।
- कंकरियों के लिए एक छोटी थैली।
- बाल काटने के लिए साफ़ कैंची या डिस्पोज़ेबल उस्तरा।
सेहत
- आपकी सारी दवाएँ, अतिरिक्त के साथ, और डॉक्टर का पत्र।
- एहराम के दिनों के लिए बिना ख़ुशबू का साबुन, शैम्पू, टूथपेस्ट, डियोडोरेंट और गीले वाइप्स।
- पट्टियाँ, बिना ख़ुशबू की क्रीम, फ़ेस मास्क, एक छोटा तौलिया।
व्यावहारिक
- छाता, एक छोटी टॉर्च, पावर बैंक और चार्जर, एक छोटा पंखा या स्प्रे।
- अपने पासपोर्ट और दस्तावेज़ों की एक कॉपी, और आपातकालीन संपर्कों की सूची।
- मशाइर के दिनों के लिए एक छोटा बैग (अध्याय 11)।
एक नज़र में फ़र्ज़, वाजिब और सुन्नत
| हज | उमरा | |
|---|---|---|
| शर्त | एहराम (नीयत और तलबिया) | एहराम (नीयत और तलबिया) |
| अरकान (फ़र्ज़) | 1. अरफ़ात का वुक़ूफ़ · 2. तवाफ़े-ज़ियारत (चार चक्कर) | तवाफ़ (चार चक्कर) |
| वाजिब | मीक़ात से एहराम · सूरज डूबने तक अरफ़ात में ठहरना · मुज़दलिफ़ा का वुक़ूफ़ · सई · रमी · बाल मुंडवाना या कतरवाना · क़ुर्बानी (क़िरान और तमत्तु) · 10 तारीख़ की तरतीब · तवाफ़े-ज़ियारत उसके वक़्त में और सातों चक्कर · तवाफ़े-विदा · पाबंदियों से बचना | सई · बाल मुंडवाना या कतरवाना · मीक़ात पर एहराम बाँधना · पाबंदियों से बचना |
अधूरा नफ़्ली हज या उमरा
एक बार नफ़्ली हज या उमरे का एहराम बाँध लें तो उसे पूरा करना लाज़िम है। अगर आपको रोक दिया जाए (दुश्मन, बीमारी या किसी और रुकावट से), तो आप क़ुर्बानी का जानवर (या उसकी क़ीमत) हरम भेजते हैं और उसके ज़बह का दिन तय कर लेते हैं; ज़बह होने पर आप एहराम से निकल जाते हैं और जो छोड़ा उसकी क़ज़ा आप पर है, हज और उमरे के साथ, या उमरे के साथ (अध्याय 7)।
हज में मन्नतें (नज़्र)
- फ़र्ज़ हज की मन्नत ज़रूरी नहीं (वह पहले से फ़र्ज़ है)।
- हज या उमरे की जो मन्नत मानी जाए उसे पूरा करना लाज़िम है, उसी साल जिसका नाम लिया हो, या उसके बाद।
- कोई काम करने का गुज़रता ख़याल मन्नत नहीं है जब तक वह ज़बान से न कहा जाए।
- मन्नत मानना पसंद नहीं किया जाता: नबी ﷺ ने ख़ुद कभी मन्नत नहीं मानी।
अपने हज को मब्रूर बनाए रखना
हज के बाद (अध्याय 1):
- गुनाह और ज़्यादती से दूर रहें।
- अपने नेक अमल बढ़ाएँ, ताकि ईमान और तक़वा ऊँचा हो।
- अपने अख़लाक़ और बर्ताव को लगातार बेहतर बनाते रहें।
اللّٰهُمَّ اجْعَلْهُ حَجًّا مَبْرُورًا، وَسَعْيًا مَشْكُورًا، وَذَنْبًا مَغْفُورًا، وَعَمَلًا صَالِحًا مَقْبُولًا، وَتِجَارَةً لَنْ تَبُورَ
उच्चारण Allāhummajʿalhu ḥajjan mabrūrā, wa saʿyan mashkūrā, wa dhanban maghfūrā, wa ʿamalan ṣāliḥan maqbūlā, wa tijāratan lan tabūr.
अर्थ ऐ अल्लाह, इसे मक़बूल हज बना दे, क़द्र किया जाने वाला प्रयास, बख़्शे हुए गुनाह, क़बूल होने वाले नेक अमल, और ऐसी तिजारत जो कभी घाटे में न जाए।
